काव्य-एस.एस.त्रिपाठी

काम, योग और भोग

काम एक प्रचंड ऊर्जा
ऊर्जा जीवन का पर्याय
जीवन यानि गति
गति से लय का जन्म
लय का अर्थ रागात्मक वृत्ति
यही आनंद है.
एक स्थिति
जहॉं अपने को
भूल जाना होता है
अर्थात् अहम् से निवृत्ति
लय का जन्म
जो आनंद है.
योगी और भोगी
दोनों की एक खोज
‘आनंद’
योगी की लय गति
ऊर्ध्वगामी है.
नाभि से हृदय तक
आनंद
हृदय से ज्ञान समाधि तक
परमानंद
इसकी इतिश्री
सोखना और पचाना है
इसलिए
योगी का आनंद शाश्वत है.
योगी
अंदर रमता है
परमानंद के लिए
जहांॅ
मैं और मन
दोनों मेरे होते हैं.
भोगी की लय गति
अधोगामी है
लक्ष्य
क्षरण है
इसलिए उसमें
अधैर्य है.
इसका धर्म
सृजन है
इसलिए संसार है
सृजन
़ऋणमुक्ति का
साधन है.
योगी भी
भोग का परिणाम है
आप बतायें
योगी बड़ा या भोगी ?

भोग और योग

भोग शरीर का धर्म
इच्छा भोग की जननी
इच्छा को मारना नहीं
उसे विकसित करना है
बिना इच्छा के भोग कहांॅ ?
बिना भोग समाज संस्कृति
सभ्यता का उन्नयन कहांॅ
ईश्वर संसार की सुव्यवस्था का नाम है.
इस व्यवस्था में तुम्हारा योगदान
संसार को सुंदर बनाना है.
मर्यादित भोग
योग का अंग है
संसार को सुंदर बनाना
भोग का धर्म है
योग और भोग
एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.

एस.एस.त्रिपाठी
फ्रेजरपुर, जगदलपुर मो.-07898891908