अंक-1-काव्य-सुनील गजनी

-1-
एक शब्द नहीं बोली
रख लिया पत्थर
हृदय पे
वेदना, सबकुछ कह गये
शब्द, आंखों से खीर-खीर
-2-
नन्हीं बूंदें अब भी
अपना अस्तित्व
दर्शा रही हैं
टीले के मुहानों पर
मानों, मुख चूम रही हों
तब तक, जबतक
पांॅवों से अछूती रहें.
-3-
ठण्ड ज़ोरों पे
नेता तापते हाथ
जलता देश
श्री सुनील गजनी 9 मार्च 14