काव्य-नलिन श्रीवास्तव

जंगली चट्टान की मौत

मेहनत कश सॉंसों की
उपलब्धि का दर्पण
चटीयल-जीवन
और उस पर
काई की फिसलन
समय भी प्रभावहीन
रपट ही जाता है.
चट्टानें
भला कभी
मोहपाश में बंधी है
जिन्दगी के छलावों से
निर्लिप्त जीवन
कितना खुशनुमा लगता है
झाड़ की फुनगी पर
झुलता हुआ.
अलसाये गांव की
दुलहन-सी भोर
लेकिन हाय!
सूनी-सूनी
पेट की भूख
एक शाश्वत प्रश्न
जैसे साधु की धूनी
सदैव धधकती!
और, शाम!
जैसे, ठण्डी चिता की राख.
सावन की फुहार
या, जेठ की तपन
कोई फर्क नहीं मानता
चटीयल-जीवन!
इनका बचपन
तपता ही तो रहा है
भूख से
भावों-अभावों से
मन भी यहीं-कहीं
दफन हो जाता है.
जंगली चट्टानों के लिये
कामनाएं वर्जित होती हैं
और
वर्जना का पर्याय-जीवन
हर भावों-अभावों को
अपनों सा अपना लेता है.
विवशता की सीमा
पिघल जाती है
नमक से
जंगली चट्टानें
तब
बेचना पड़ता है
नमक के मोल
नमक से तीखे
श्वेद कणों को
मेहनत कश सॉंसों को
हरियायी मधुमासों को.
विवशता के खरीददारों की
कोई कमी नहीं.
ये खरीददार
खरीदी हुई
जंगली चट्टानों पर
मुखौटा लगा देते हैं,
अपनों सा
बे-चेहरा बना देते हैं
और तब
झाड़ की फुनगी पर
झूलता जीवन
जमीन पर टिक कर
बस लुढ़कता रहता है.
इन जंगली चट्टानों
के चहुं ओर
उग आता है
शोर भोर
भुलावों का जंगल
जहां खुद से अनजान
हर क्षण कई मौत
मरता है
बेमानी होकर
हर एक जंगली चट्टान.


श्री नलिन श्रीवास्तव
वार्ड नंबर-32,
ब्राहम्णपारा
राजनांदगांव, छ.ग.
मो.-07587160610