हलबी कविता -नरेंद्र पाढ़ी

भुतयार

मंय भुतयार आंय
मसागत करून खंयसे,
कुटुम संगे
हरिक ने रहेंसे।
मंय मसागत करेंसे
मसागत चो खांयसे
मके कांइ सकुक निहाय
गाड़ी-घोड़ा, रूपया-पैसा
मांतर,
पिला मनके पड़ांयसे,
दुई पहार काजे भात,
देंहे काजे कपड़ा
काचोय पुरे भिक नी मांगे।
नानी असन टुटतो कुड़िया
मचो छानी आय सरग,
डसना आय धरती माय
सीत घाम चमास
मचो संगवारी,
एई मन संगे
हरिक ने जियेंसे।
गुलाय मंझन पसना थिपांयसे
थाकुन फुटुन
राति मन भर सोयेंसे
मय भुतियार आंय।

नरेन्द्र पाढ़ी
रहमान गली,
पथरागुड़ा, जगदलपुर
जिला-बस्तर
पिन-494001
मो.-9425536514