डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी की वॉल से
गीत -1
सूख चुके अधरों से, मधुर गीत क्या गाऊँ ?
काल नग्न नाच रहा, शोक है, विलाप है।
हर तरफ से सिर्फ शोक समाचार मिलते हैं।
सूरज के साथ रोज मृत्युदूत खिलते हैं।
किसको मैं ढाँढस दूँ, किसको मैं समझाऊँ,
जगती भयभीत हुई कैसा अभिशाप है ?
सूख चुके अधरों……….
गाँव-गाँव नगर-नगर हाय करुण क्रंदन है।
रौंद रहाँ साँसों को मृत्यु का स्यंदन हैं।
देख देख सोच रहा, कैसे मैं बतलाऊँ।
अंतस को जला रहा, पीड़ा का ताप है।
सूख चुके अधरों………………….
गीत-2
उर में अवसाद है।
चाँदी सी शुभ्र रात
हवा भी मचल रही है।
नदिया के तन पे, धवल-
चाँदनी फिसल रही है।
पूर्ण प्रकृति, रिक्त हृदय,
कैसा अपवाद है ?
उर में अवसाद…..
कोयल की कुंजन से,
भौरों के गुंजन से।
एक नव बसंत हुआ,
महक चली उपवन से।
जल भुन बैठा जवास ,
चहुँ दिशि उन्माद है।
उर में अवसाद…….