प्रीति प्रवीण खरे की कविताएं

द्रोपदी

हाथ पकड़ कर दुशासन मौन सभा में लाया
पांडव कुछ भी न बोले माँं का दूध लजाया
मेरी करूण वेदना पर किसी को दया न आई
सूरज निकला था पर जीवन में भोर न आई
सबकुछ पांडव हारे दांवों पर मुझे लगाकर
दुर्योधन शकुनी खुश थे छल से मुझको पाकर
राजा अन्धे, द्रोण, भीष्म, गंधारी मौन रही
धुंधले धुंधले अम्बर सहमी धरती मौन रही
व्याकुल थे तन मन गहन अंधेरों को भाँप गया
मेरी लाचारी पर काल समय भी काँप गया
अपमान हुआ केषों को खोले मैं कहती हूँ
सांँसें अन्तिम हो अन्याय नहीं मैं रहती हूंँ

कोख़

कोख़ माँ की आज बदनाम हो रही
आबरू बेटी की नीलाम हो रही
आज तू रावण का अवतार बन गया
जीते जी बेटा गुनहगार बन गया
मांगा था बेटा बेटी एक साथ में
माँ से बेटी यह कहे हँू अनाथ में
कोख़ को बदनाम होने नहीं देगे
बेटियों को लाज खोने नहीं देगें
नूर इससे ही है रोशन जहान का
खूबसूरत राज कुदरत महान का
बोझ घरती का नहीं जान लीजिए
बेटी को जीने का वरदान दीजिए

भावों का झरना

उठते भावों से
भीग रहा है तन मन
कभी मैं खुश होती हूँ
धवल तरंगों से
जैसे कोई गीत सुनाएँ
जंगल की तन्हाई में
उड़ते पंछी इच्छाओं के
यहाँ-वहाँ घूम रहे
इन आशाआंे के संग-संग
कभी तो फूटेगा
तुम्हारे हृदय का झरना
गिरती बूंदों के संग-संग
बहती जाऊँगी साथ तुम्हारे
जीवन के सागर को
पायेगें हम दोनों
मुझे प्रतीक्षा है केवल
तुम्हारे प्यार के झरने की
तुम्हारे प्यार के झरने की।।

आशीष

ऐ मित्र!
उठो संभलो जागो
स्वयं अपनी राह बनाओ
शिखरों पर चमको
वाणी में विनम्रता लाओ
सब के साथ चलो
कर्मठता से भाग्य बनाओ
तम के बादल से निकलो
कर्मठता का सूरज
हाथों में लेकर
उजले अम्बर पर नाम लिखो
जो बीत गया
जो छूट गया
उसको भूलो
बाधाओं को पार करो
विश्वासों से नई उड़ान भरो
व्यर्थ समय न नष्ट करो
निराशाओं को दूर करो
आशाओं को साकार करो
ऐ मित्र!
सबके आशीषों को स्वीकार करो
नये नीड़ का निर्माण करो।।

प्रीति प्रवीण खरे
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