काव्य-कमलेश चौरसिया

‘‘मैं…..मैं….और….मैं!’’

यह पृथ्वी मेरी है
यह ब्रम्हांड मेरा है
यह सम्पत्ति मेरी है

मैं जो चाहूं-
वह करूं,
मैं चाहूं तो
इससे प्यार करूं
इस पर अपना
सब कुछ वार दूं,
अथवा!
मैं चाहूं तो
इसे धूल चटा दूं.

पेड़ पौधे को काट-
मरूस्थल बना दूं,
जल-अमृत को-
सागर में मिला दूं,
हवा को धुंआ कर दूं.

पृथ्वी का दोहन कर-
खाई बना दूं,
पृथ्वी का लोहा निकाल
अपनी विद्वता प्रदर्शित कर
आकाश में फेंक दूं
नीले अंबर को बना दूं
‘डस्टबीन’.

ईटों का भट्टा लगा-
धरती पाट दूं,
प्यास बुझाने के-
एक-एक छेद को-
बन्द कर दूं,
तड़पती रहे छाती,
उसकी ताल पर
मैं करूं ताण्डव,
बिलबिलाते प्राणों के
हाहाकार में
मैं करूं अट्टहास
क्योंकि ?

मैं आकाश हूँ
मैं मिट्टी हूँ
मैं हवा हूँ
मैं अग्नि हूँ
मैं जल हूँ
मैं सब में हूँ
सब मेरा है.

मैं……….मैं केवल
मैं ही हूँ
हृदय के हीरे
कोख से उगता धान
सब कुछ मेरा है
दसों दिशाओं से गूंजे
मैं……..मैं…..मैं…..

‘मैं’ के तांडव और अट्टहास में,
रहस्यमय यथार्थ में,
जब कहीं! ‘मैं’
डर जाऊं
डर में ‘मैं’ थर-थर कांप जाऊं
कांपता-कांपता ‘मैं’
पिघल जाऊं,
पिघलता-पिघलता मैं’
जब!
समा जाऊं मिट्टी में,
खो दूँ अस्तित्व,
समर्पण कर दूँ ‘मैं’ को
तब!
समर्पण से फूटे-
एक अंकुर।

उस अंकुर में समाया
सर्वस्व-जो बिखरा है
अंदर और बाहर,
जिसके आत्मसात से
आठों पहर आती है
एक रेख-
मुस्कान की.

उस मुस्कान से रोमांचित ‘मैं’
असीम शीतलता सा घुल
समा जाऊं कण-कण में,
आचमन कर प्रीत का
बन जाऊं फूल,
सुवासित कर पवन को
समर्पित हो जाऊं
चरणों में
‘अनन्त’ के।।

हायकू
मेरे सपने
विराट संकल्प के
शक्ति पंुज है

धूप या छाँव
सुख-दुःख की माया
एक छलावा

चाँद सितारे
उतरे धरा पर
तुम आओ तो

नई किरणें
द्वार खोले खड़ी हैं
बाहर आओ


श्रीमती कमलेश चौरसिया
गिरीश-अपार्टमेन्ट 201
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