अशवनी कुमार मेहरोत्रा ’उम्मीद’ की लघुकथाएं

चोर – पुलिस

चोर ने महंगी कार से मोटी सी महिला को निकलते देखा, नजरे उसके पर्स पर जम गई जो काफी भरा भरा और मोटा था। अचानक चोर पर्स झपट कर दूसरी दिशा में भागा।
“चोर चोर, पकड़ो“ महिला पूरी ताकत से चिल्लाई तो दूसरी तरफ से आता हवलदार कड़क आवाज मे बोला “ ठहर, अभी देखता हूं, तुझे“ चोर के 15-20 कदम सामने ही हवलदार था दोनों ने एक दूसरे को देखा और बहुत हौले से मुस्काए।
चोर सामने रास्ता न पाकर गली में घुस गया उसके पीछे पीछे हवलदार भी, गली मे 3-4 गलियां और थी।
मै पूरा नजारा देख रहा था और ये भी कि हवलदार ने उसे देखकर भी अनदेखा कर दिया है और उधर ढूंढ रहा है जहां वो है ही नहीं।
मुझे अपना बचपन याद आ गया जब हम चोर पुलिस खेलते थे परन्तु हम तो ईमानदारी और सच्चाई से किरदार अदा करते थे। चोर पुलिस तो असल मे ये लोग खेल रहे है।
तभी हवलदार वापस आया और महिला से बोला “निकल भागा साला, मै रिपोर्ट दर्ज कराता हूं, पर्स में क्या क्या था, लिख दीजिए…….शायद उसे चोर पर विश्वास नहीं था।

दिहाड़ी

“लेकिन पिछली बार 500 रू पर हेड लिया था न“ जनार्दन बोला।
“साहब 5 बरस हो गए, मंहगांई भी बहुत बढ़ गई है और इस बार तो काफी मालदार पार्टी की तरफ से आए है आप, 800 से कम नही होगा। 5 रैलियों के हिसाब से पर हेड 4000 से एक रूपया भी कम नही होगा। यही तो सीजन है फिर आप कहां मिलेंगें…..“ दीनू हाथ जोड़कर बोला।
“ठीक है परसो सुबह 350 लोग तैयार रहें, 7.30 बजे बसें आ जाएगीं, फिर 2 दिन बाहर ही बाहर रहना होगा। सब तैयारी से आएं। हम केवल रात का खाना देंगें।“
“ठीक है“ दीनू बोला।
सही समय पर सब रैली में पहुंच गये।
20 मिनट बाद भाषण शुरू हुआ “हमारी सरकार बेरोजगारी और मंहगांई के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है। हम पिछली सरकार की तरह मजदूरों को अपनी योजना के तहत 500 रू पे नही बल्कि 800 रू दिहाड़ी के हिसाब से काम देगें।“
भीड़ जोर जोर से तालियां बजाने लगी।

अमावस

आंख खुली तो कुछ गिने चुने तारे आसमान पर धुंधले धुंधले से दिख रहे थे, आज अमावस की रात थी शायद इस कारण। पास रखे मोबाईल का बटन दबा कर देखा तो 1.47 बजे थे। चारों तरफ घुप्प अंधेरा था। नींद लघुशंका के कारण खुली थी सो छत के दूसरे कोने की तरफ बने वाशरूम की तरफ कदम बढ़ा दिए। लघुशंका के बाद वापस बिस्तर की तरफ आते समय अचानक सहम कर रूक गया। बिस्तर के पास कोई पूरे शरीर पर सफेद कपड़े पहने खड़ा था, शायद कोई औरत थी। मेरी नसों में बहता खून मानो जम सा गया था। बड़ी मुश्किल से सांस ले पा रहा था मैं।
उसके सारे बाल बिखरे थे, चेहरा लगभग बालों से ढका था। मेरे पैरों तले जमीन सरक गई, “यहां कोई कैसे आ सकता है“ क्योकि छत का दरवाजा अभी भी अंदर से बंद था। आज ये सत्य पता चला कि भूत प्रेत वाकई में होते है , वहां से भागने के लिए दरवाजा तो था लेकिन उस अपरिचित की तरफ से ही जाना पड़ता। तीन मंजिला इमारत के नीचे कूदना भी आत्महत्या ही कही जाती। सब लोग नीचे घर में सोए थे मै ही जिद करके छत पर सोने आया था, अब 17 का जो हो गया था।
तभी वो मेरी तरफ बढ़ने लगी, हनुमान चालीसा पढ़ते हुए उसे करीब आते देख रहा था मै। पैर कांप रहे थे डर के मारे, गले से आवाज़ भी नही निकल रही थी।
वो करीब आ चुकी थी। मेरे शरीर में नाममात्र का ही जीवन शेष था। उसकी आंखे बालों के पीछे से चमकती हुई दिख रही थी।
तभी उसने अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रखा। मेरी दबी दबी सी चीख निकली, उसने दूसरा हाथ मेरे सर पर रखा, पूरी ताकत बटोरकर मै जोर से चीखा “बचाओेेेे….
तभी वो भी इतनी जोर से चिल्लाई कि मेरी नींद खुल गई “कितनी बार इसे समझाया कि रात को सोने से पहले मोबाईल पर घंटों घंटों डरावनी फिल्में मत देखा कर, पर ये माने तब ना, सत्यानाश हो इस मोबाईल का। मै इसे प्यार से जगाने आई तो मुझ से ही डर गया।
सपना टूट चुका था, मै अपने बेडरूम में बिस्तर पर बैठा खिसियाआ हुआ दीदी का चेहरा देख रहा था। दीदी गुस्से में थी। अभी नहाकर आई थी बाल सुखाने के लिए खोल रखे थे जो चेहरे पे आ गये थे। बालों के पीछे से बड़ी बड़ी आंखे चमक रही थी। आज कालेज का पहला दिन था इसलिए उसने अपनी फेवरिट सफेद ड्रेस पहन रखी था।

दृष्टिकोण

गैलरी में अपनी टीम के साथ चलते हुए रणविजय को लगा कि अंदर कुछ ज्यादा ही हलचल हो रही है।
रणविजय के पैर की एक ठोकर से दरवाजा खुला तो सबने देखा 10-12 लड़के 2 लड़को को डांस करवा रहे थे । डांस न आने के बावजूद दोनों उल्टे सीधे हाथ पांव मार कर हास्य का विषय बनने को मजबूर थे । रणविजय के आगमन से सबके चेहरे फक्क पड़ गए थे।
रणविजय ने अपने साथ आए लड़को से कहा। “इनकी फोटो खींचो ताकि ये गलत नाम बताएं तो भी पकड़ मे आ सके, नाम के साथ ये भी लिखो किस पाठ्यक्रम के है ये।“
डांस करने वाले लड़कों को छोड़ बाकी सब माफी मांगने लगे।
तभी रणविजय के लड़कों ने सबको इन्वीटेशन कार्ड पकड़ाया तो रणविजय बोला “तुम सभी सीनियर स्टुडैंट्स परसो शाम को आने की तैयारी करो, तुम लोगो के सम्मान में नये स्टुडैंट्स एक रंगारंग कार्यक्रम करेंगें। आप में सें ही कुछ लोगो को जज बनाया जाएगा। बाकी सभी सीनियर स्टुडैंट्स परफॉर्मेंस पर शालीनता के साथ मजेदार, हास्यात्मक एवं व्यग्यांत्मक टिप्पणी कर सकते है।
परंतु परफॉर्मेंस मे डांस, अभिनय, गायन, केरीकेचर किसको क्या करना है वो केवल नये स्टुडैंट्स ही तय करेंगें, हम सीनियर स्टुडेंट्स नहीं।“ कहकर रणविजय अपनी टीम के साथ आगे राउंड पर निकल गया।
युनिवर्सिटी के अध्यक्ष रणविजय ने 2 मिनट मे रैगिंग की परिभाषा ही बदल दी थी।

लाईब्रेरी

“ये हमारा बेडरूम है“ मैथिली प्रसाद ने सभी मेहमानों को दिखाते हुए कहा “और बगल में ही किचन, इसके पीछे गार्डन और हां आगे राईट में चलिए“
जैसे ही सब लोग राईट की तरफ मुड़े, एक सुंदर एवं सुसज्जित प्यारी सी लाइब्रेरी दिखाई दी। मैथिली प्रसाद बोले “लेखक होने के नाते मैने घर में इस लाईब्रेरी को भी उतनी ही शिद्दत से बनवाया है जितना घर के मंदिर को, आखिर यहां भी तो मां सरस्वती वास करती है।
उनके मुख से इन गूढ़ पंक्तियों को सुन मोबाईल पर व्यस्त कुछ लोगों के साथ सभी वाह वाह कर उठे।

मैथिली प्रसाद देश के नामी और सम्मानित साहित्यकार थे। देश ने उन्हे कई पुरूस्कारों से नवाजा था। उन्होने बताया “ मैने इस लाइब्रेरी में बहुत ही उच्च कोटि की कृतियों को स्थान दिया है, शायद समूचे देश में इस तरह का यह पहला अनूठा संग्रह होगा, कई पुस्तकें तो अति दुर्लभ थी परन्तु मां सरस्वती ने उन्हे मेरी लाईब्रेरी का हिस्सा बना दिया। बड़े चाव से खरीदा था इन पुस्तकों को……“ उनकी आवाज थोड़ी भारी हो आई थी। “ज्ञान का सागर है ये , सोचा था सभी को पढ़ूगा । 1 साल तक तो खूब पढ़ा, बहुत ज्ञानवृद्वि हुई लेकिन…….कह के वो सर झुका कर चुप हो गए
“लेकिन क्या सर ?“ एक अतिथि ने पूछा
“फिर व्हाट्सएप, फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया का चलन बहुत ज्यादा बढ़ गया। अब कभी व्हाट्सएप, फेसबुक पर आयी पुस्तक के किसी अंश की सत्यता का पता लगाना हो तो इस लाईब्रेरी में आ जाता हूं।“

 

अशवनी कुमार मेहरोत्रा “उम्मीद“
पता – । – 54, मकान नं. 8, सेक्टर 21,
तुर्भे कालोनी, तुर्भे, नवी मुंबई
E mail id – mehrotraashwani@yahoo.com
मो. 9820586422

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