कविताएं-त्रिलोक महावर

कविताएं-त्रिलोक महावर

पेंजई

पीठ फेरते ही
वे दाग देंगे
दस -बीस गोलियाँ
और एक खंजर
उतार देंगे आर-पार
ऐसी उम्मीद तो कतई न थी
बातें सब तय हो चुकी थीं
ढाई इंच की मुस्कान के साथ
कहा था उन्होंने ’बाय ’
कल फिर मिलने का वादा था
पर कल के लिए
कुछ भी बाकी नहीं छोड़ा था उन्होंने
यकीनन भरे होंगे
किसी दोस्त ने कान
कान का भरा जाना उतना खतरनाक नहीं है
जितना कान का कच्चा होना,
एक अर्से बाद जब होगा उन्हे एहसास
कि वे गलत थे
तब तक पेंजई के फूलों में
उभरे स्केल्टन हो चुके होंगे
हम!
(पेंजई के फूल बसंत में खिलते हैं। इन फूलों की पंखुड़ियांे में मानव सिर का डरावना कंकाल दिखाई देता है। इन फूलों को देखते हुए लगता है मानो बगीचे में स्केल्टन ही स्केल्टन पंखुड़ियों पर छा गये हैं।)

फलसफा

दर्द मन का आँखों से जब झर गया
आपकी आखों को क्यों नम कर गया,
मौन अधरों का भला क्या दोष इसमें
अश्रु ही जब मौन मुखरित कर गया,
छाँव में बादल की जाने कौन से क्षण
धूप का टुकड़ा उजाला कर गया,
पुष्प था जीवन तो काँटों में पलकर
विश्व को सौरभ लुटाकर झर गया!

पिता

नहीं रहे वे
तब अहसास हुआ
जेठ की धूप का
बादलों ने भी हिमाकत की
तरबतर करने की
माघ की कंपकपाती सर्दी में
पाला पड़ ही गया
पहली बार मालूम हुआ
ओले बर्फ के कंचे नहीं होते,
दुनियाँ भर की बलाएँ
सहमती थीं उनकी आँखों से
मेरे नन्हें कदमों के लिए
उनके कंधे ही थे माउंट एवरेस्ट
पीठ पर सवार होने पर
इच्छाएं लेती थीं
अंतरिक्ष तक उड़ान!
खाली पर्स के बरक्स वे
कुबेर का खजाना थे,
उनकी उँगली थाम महफूज
रहा डगमगाने से,
सुरक्षा कवच थे,
उनका होना, होने से
बहुत ज्यादा होना था!

किताब

जिंदगी क्या है
एक किताब है
जिल्द
जैसे माँ बाप का साया,
पत्नी मुखपृष्ठ
बच्चे बाद का कोरा पन्ना,
हरएक पन्ना जैसे समय बांचता
उम्र का अगला पड़ाव
जब तक
किताब खुली है
खुली है
शेल्फ में जाने से पहले!