लघुकथा-माधुरी राउलकर

अपनी मंजिल

शलाका अपनी गृहस्थी में खुश थी। नई-नई शादी हुई थी। पति भी अच्छा मिला था। बाजू के ही फ्लैट में रहती थी। आते जाते हाय हलो हो जाती थी। जिन्दगी अपनी रफ्तार से चल रही थी। शादी के दो साल हो रहे थे। घर में नन्हा मेहमान आने की खुशी में दोनों बेहद खुश थे। एक दिन उसने नन्हीं बच्ची को जन्म दिया। उनकी खुशियां और बढ़ गईं।
कहीं कोई कमी नहीं। लेकिन जिन्दगी अपने हाथों में ऐसे ऐसे पत्थर लेकर रहती है कि कौन सा पत्थर किसकी जिन्दगी को चूर-चूर कर देगा पता नहीं होता है। ये पत्थर कभी नुकीले होते हैं, पथरीले होते हैं तो कभी सजीले भी होते हैं।
जिन्दगी हाथों में लेके पत्थर एक दिन
किस रूप में दिखाएगी असर एक दिन।
ऐसा ही उसके साथ हुआ। शलाका के माता पिता अपनी बेटी और नाती को देखने दूसरे शहर से आने वाले थे। शलाका के पति ने कहा-‘मैं कार लेकर स्टेशन पर जाता हूं और उन्हें लेकर आता हूं।’ और उसने कार निकाली और चल पड़ा। आधी दूर जाते ही एक ट्रक ने टक्क्र मारी और वहीं पर उसकी मृत्यु हो गई। सुबह देखा हमारी बिल्डिंग में इतनी भीड़ क्यों जमा है ? पता चला उसके पति की मृत्यु हो गई है। शलाका का तो रो-रोकर बुरा हाल था। छः दिन की बेटी को लेकर वह अस्पताल से घर आई और सातवें दिन उसके पति का शव उसके सामने पड़ा था।
वक्त गुजरता गया। जिन्दगी कहां किसके लिए रूकती है ? उसने तो अनवरत चलने का जैसे व्रत लिया हो। एमबीबीएस के प्रथम में वह पढ़ रही थी। ससुराल वालों ने उसकी बच्ची को संभाला और उसे पढ़ने की प्रेरणा दी। बच्ची भी बड़ी होती जा रही थी। वह भी पढ़ रही थी। एमबीबीएस किया फिर एमडी किया। और आज वह शहर के एक बहुत बड़े अस्पताल की संचालिका है।
एक दिन शलाका थकी हारी मुसाफिर थी लेकिन आज वो ऐसी मुसाफिर है जिसे अपनी मंजिल मिल गई है। उनके इरादे, दृढनिश्चय और ईमानदारी को प्रणाम करती हूं। आज भी मिलती है तो वही नई उमंग, आशा के साथ।


माधुरी राऊलकर
76 रामनगर
नागपुर-440033
महाराष्ट्र
मो.- 8793483610