ग़ज़ल- सुनीति बैस

ग़ज़ल


वही मंजिलों की दिशा जानता है
बता देगा, वो रास्ता जानता हैै।
मुझे क्या पता क्या हो अंजाम आगे,
फ़क़त मेरा मन चाहना जानता है।
फ़कीरों की बातें मैं कैसे समझूं,
फ़कीरों की बातें ख़ुदा जानता है।
वफाओं का दम लोग भरते हैं अब भी
वफा का वो लेकिन सिला जानता है।
सखावत के किस्से उसे मत सुनाओ
लुटेरा तो बस लूटना जानता है।

बना ही लेंगे कहीं न कहीं मकां अपना,
मिटा न पायेगा कोई कभी निशां अपना।
रहे जहां भी तो ख़ानाबदोश बनके रहंे
बनाना चाहते हैं हम भी आशियां अपना।
सभी जहां में क्या मतलबपरस्त होते हैं
हमें दिखा ही नहीं कोई मेहरबां अपना।
कभी तो उसको भी दिखलाएं जख़्मे दिल अपना
बना लिया है जिसे हमने राजदां अपना।
हमें बताओ कि शाख के परिन्दे हैं
न जब ज़मीन ही अपनी न आस्मां अपना।

सुनीति बैस
सी 34
आर. के. पुरी
ठाटीपुर ग्वालियर
म.प्र.
मो.-09425757175