के प्रिया की कविता

पिंजरा

कहीं भी जाऊं, मेट्रो की गंध हवा में फैली है
मेरी जड़ें सांसें खींचती इन सीमेंट-ईटों के बीच।
ये बीते दिनों की बातें हैं जब हमारे पूर्वज
भरी बरसात और आजाद हवा में सांसे लिया करते थे।
बरगद की शाखों पर बैठे मेहमान,
चहचहाते व गीत गाते थे।
हवाओं की तरंगों में आबाद थे
मानव भी नटराज थे अपनी लय व आनंद में।
आह! उन घातक हवाओं ने मुझे कैद कर दिया है
मेरी जड़ों को सीमेंट और ईटों के पिंजरे नसीब हैं।
मेरे कुछ पड़ोसी हैं जिन्हे पाकर मैं प्रसन्न नहीं,
बिल्कुल नहीं।
मेरे पड़ोसियों की आबादी बढ़ रही है-
सीमेंट और ईटों की दीवारों में कैद होने को….।

के.प्रिया

अधिवक्ता हाईकोर्ट चेन्नई
‘ईरावीइलम’
31/156, पालनिप्पा, नागर
सुरामंगलम, सालेम, तमिलनाडु-636005
मो-09443216216