लाला जगदलपुरी-संस्मरण : हिमांशु शेखर झा

जिनके सिर पर धूप कड़ी…… दुनिया उनकी बहुत बड़ी

लालाजी पर कुछ लिखना, मेरे लिए वैसा ही है जैसा कि अपने परिवार के किसी बुजुर्गवार के बारे में याद करना…. जब मेरे आत्मीय सम्पादक ‘बस्तर पाति’ ने मुझसे संस्मरण के लिए कहा तो न जाने कितनी ही यादें जो झील से मन की तलछटी में पैठ गईं थीं.. उभरने लगीं-तल पर..!
दरअसल, हम बहुत ‘छोटे’ हैं… लाला जगदलपुरी पर कुछ कहने-लिखने की हैसियत नहीं हमारी…. पर हां घरेलू जैसे संस्मरण कई हैं…मेरे पिताश्री प्रो.(डॉ.) बी.एल.झा, चाचा श्री शंभुनाथ एवं बाबू चाचा यानि डॉ. के.के.झा से बड़ी निकटता रही लालाजी की..! लिहाज़ा मैं अपने छुटपन से उन्हें हमारे घर आते-जाते कविताएं सुनते-सुनाते और यहां तक कि लिखते-पढ़ते भी देखा करता था…उस वक़्त बस्तर संदेश-नव संदेश अर्द्धसाप्ताहिक अखबार हमारे घर से ही निकलता था…यह बात होगी 72 के आसपास की…। लालाजी सम्पादन में सहभागिता देते…।उनकी हस्तलिपि और ख़ासकर उनके हस्ताक्षर मुझे बहुत चौकाते..! छोटा था…तो चकित रह जाता…और उनके हस्ताक्षर की प्रतिकृति उन्हें ही दिखाता…वे स्नेह से देखते और ठहाका लगाते….कहते ‘बड़े होकर तुम भी कवि बन जाना…फिर ऐसा दस्तख़त कर लेना।’
उस वक्त हमारा जगदलपुर भी क़ाफी छोटा था…पर…पर यहां लोगों के दिल ख़ूब बड़े थे…शहर एक बड़े से परिवार की मानिन्द हुआ करता और हम बच्चे किन्हीं को दादाजी, चाचा, भैया, दीदी, परिवार-परिजनों के संबोधन से ही जानते…..। इस कस्बे में उन दिनों ‘बड़े लोग’ रहते थे अब….शहर बढ़ गया…पर लोग…?
मुझे याद है लालाजी की पहली किताब ‘हल्बी पंचतंत्र’ के नाम से छपी थी…‘बस्तर प्रिंटिंग प्रेस’ में-जो डॉ. के.के.झा का ही प्रेस था उन्होंने पंचतंत्र का हल्बी अनुवाद करने का सुझाव लालाजी को दिया था…इसकी कंपोज़िंग और ट्रेडल प्रेस पर प्रिंटिंग मुझे आज भी याद है…मुझे याद है कि इसकी बाइंडिंग के बाद कटिंग में थोड़ी चूक रह गई और सैकड़ों पुस्तकें थोड़ी आड़ी कट गईं थीं…जिसे लेकर लालाजी और झा’साब ख़ूब हंसी-मज़ाक भी करते…।
एक और वाक़या-सन् 83 की बात होगी…सुबह 10 बजे के आस-पास, मैं घर के ऊपरी कमरे में पढ़ाई कर रहा था कि नीचे मैंने किसी की पुकार सुनी ‘सर…सर…सर हैं क्या हमारे ?’
मैंने नीचे उतरकर दरवाज़ा खोला…तो जो सज्जन सामने थे-उन्होंने कहा-‘मैं…गुलशेर…शानी’ मैंने तुरंत उन्हें प्रणाम किया और बताया कि पिताश्री तो रायपुर गये हैं..तो उन्होंने पूछा-‘तुम राजू हो न..? चलो मेरे साथ ‘कवि निवास’ चलते हैं।’…और हम चल पड़े…हमारे घर के पीछे की सड़क पर करीब फर्लांग भर की दूरी पर ही-बस्तर ही नहीं देश के महाकवि का निवास ‘कविनिवास’ डोकरीघाट पारा…!
जल्द ही वह पल आ गया जो मुझे आज भी रोमांच से भर देता है। मेरी आंखों के सामने ऋषितुल्य कवि और बेहद संवेदनशील कथाकार, हमारे लालाजी एवं शानी; जिन्हें लालाजी ने गले ही लगा लिया था। काफ़ी देर बैठने का अवसर मिला! बीच-बीच में दोनों के ठहाके…कुछ बातें मेरी समझ में आतीं…..कुछ नहीं! अद्भुत अनुभव था यह।
आपको शायद ही मालूम हो कि शानीजी को जहां मेरे पिता ने पढ़ाया था वहीं डॉ.के.के.झा घनिष्ठ मित्र थे; शानी जी-मेरे पिता को ‘सर’ ही कहा करते थे…और डॉ.के.के.झा को ‘बाबू’…यह घरेलू नाम था-डॉ.के.के.झा का। ख़ूब आत्मीय संबंध थे-इन सबमें।
यादों की गठरी खुल ही गई तो लालाजी की एक और बात बताता चलूं…यह जहां तक सन् 90 की बात होगी…17 दिसम्बर आने को था…लालाजी सत्तर के हो जायेंगे..उन दिनों मेरे अभिन्न कविमित्र त्रिजुगी कौशिक भी मेरे घर के ठीक सामने रहने लगे थे…हमने तय किया कि लालाजी के इस जन्मदिवस पर कुछ नया किया जाये…हमने एक-एक कविता लिखी और छपने को भेज दी, ‘अमृत संदेश’ ने अपने साहित्यिक पन्ने पर बड़ी प्रमुखता से छापा, शीर्षक था-‘लाला जगदलपुरी’ और साथ थी-लालाजी की एक तस्वीर भी…! लालाजी ने भी ख़बर पढ़ी-और जब मुलाकात हुई तो कहा-‘तुम लोग भी अच्छा लिख रहे हो..!’ फिर हंसकर कहा-‘मुझ पर ही लिख दी..तुम लोगों ने कविता..!’ हमने आशीष लिया तो वे भावुक हो गये थे!
एक और वाक़या लालाजी को अधिकांश ने पांव-पांव, नित्य नगर परिक्रमा करते देखा था…किन्तु उन्हें शहर के बाहर लेकर गये डॉ. सुरेश तिवारी हमारे कविमित्र…तिवारीजी तोकापाल में रहते हैं। उन्होंने एक रोज़ मुझसे कहा कि लालाजी को वे अपने घर निमंत्रित करना चाहते हैं…मैं इसमें उनका साथ दूं….मैंने कहा पता नहीं शायद टाल दें…फिर हमने तय किया कि बंशीदादा (प्रसिद्व चित्रकार श्री बंशीलाल विश्वकर्मा) भी साथ रहें तो शायद लालाजी मान जाएं। यह युक्ति सटीक थी…लालाजी, बंशीदादा और मैं दिन भर सुरेश भाई के तोकापाल निवास में रहे…श्रीमती तिवारी का आत्मीय आतिथ्य और शाम तक कुछ साहित्यिक तो कुछ घरेलु बातें…बुज़ुर्गों का आशिर्वाद-स्नेह…सारा दिन स्मरणीय रहा।
यादें और भी हैं ढेरों…पर अब ठहरता हूं.. कभी मौक़ा मिला तो महाकवि बाबा नागार्जुन के हमारे घर पर लंबे समय तक प्रवास के दौरान इन विभूतियों से संबंधित बातें बताऊंगा…! अब हमारे लालाजी को विनम्र भावांजलि देते हुए लेखनी को विराम दे रहा हूं…स्मृतियों को नहीं…!

हिमांशु शेखर झा
कुंवर बाड़ा, विजय वार्ड, जगदलपुर जिला-बस्तर
मो.-09424285268