लाला जगदलपुरी-संस्मरण-धनेश यादव

लाला जगदलपुरी से मेरी मुलाकात

15.04.2001 को कोण्डागांव में आदरणीय रावल सर के काव्य संग्रह ‘‘कुचला हुआ सूरज’’ के विमोचन के अवसर पर ऐसे महान कलमकार से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। वहीं पर डॉ. धनंजय वर्मा जी से भी मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरी डायरी में दोनो महान विभूति के हस्ताक्षर अंकित है।
पुनः द्वितीय अवसर 19.12.2001 को रावल सर के प्रयास से आकाशवाणी जगदलपुर में मेरी कविताओं के पाठ की रिकार्डिंग पर मिला। तत्पश्चात हम दोनों बस्तर की महान विभूति आदरणीय लाला जगदलपुरी के घर कवि-कुटीर गये। वहां पर एक घण्टे का वार्तालाप मेरे जीवन के अविस्मरणीय क्षणों में एक है। दो दिन पूर्व ही ईद के ही दिन याने 17 दिसम्बर को यह समय था उनके 81 वें जन्म दिन का। लाला जगदलपुरी जी उन दिनों के कटु अनुभव को याद कर रहे थे जबकि उस जमाने में साहित्य यात्रा इतनी सरल नहीं थी। विकट संघर्ष, पथरीला रास्ते, कंटीली पगडंडी, खाई और पहाड़ जैसे उतार-चढ़ाव वाली लंबी यात्रा का सफर करते हुए जिस महामानव ने अपने जीवन का 81वां पड़ाव पार किया था। उनकी स्मृति के खजाने में न जाने कितने अनमोल रत्न भरे पड़े थे। कुछ स्वार्थी तत्वों ने उन्हें लूटा-खसोटा पर उस दरिद्र साहित्यकार के हृदय मेंं तब भी अपने प्रिय-बस्तर के लिए अनमोल प्रेम उपलब्ध थी। दुर्भाग्य है हमारी पीढ़ी का कि उनको जो सम्मान मिलना चाहिए था वह उन्हें नहीं मिल पाया। पर ऐसे महान लोग सम्मान की चाहत रखते ही कब हैं। मैं अपने श्रद्धा-सुमन इस कविता के माध्यम से कर रहा हूँ-
अक्षरादित्य
कद लंबा – कुरता लंबा, ऊंची जिनकी भाल/कद लंबा -डग भी लंबा, लंबी उनकी चाल।
उम्र भर लिखते रहे, लिख गये इतिहास/युग पुरूष करते नहीं, यशोगान की आस।।
हम ऋणी, तुम भी ऋणी, रहेंगे सालों-साल/ऋषि तुल्य जीवन जिनका, कहाँ मिले मिसाल।।
शत्-शत् नमन तुम्हें हैं करते, हे अक्षरादित्य/बात उठे साहित्य की, याद करें तुम्हें नित्य।।

धनेश यादव ‘‘कमलेश‘‘
बखरूपारा, नारायणपुर
पिन-494661
मोबाईल-9424286572