लघुकथा-आवाजें-डॉ. शैलचंद्रा

आवाजें

आज उसके घर से आने वाली सारी आवाजें बंद थी। जब भी वह अपने काम से घर लौटता तो पाता घर में कोई न कोई आवाजें आती ही रहती थीं। कभी बर्तन मांजने की, कभी कपड़े धोने की तो कभी रसोई में खटर-पटर की आवाजें। जो सुधा के अस्तित्व का भान कराते। सुबह से रात तक घर में ऐसे तमाम किस्मों की आवाजों से वह चिर- परिचित था।
कभी दोपहर में वह घर आता तो उसे लगता कि शायद अब घर में कोई आवाजें नहीं आ रही होगी। शायद सुधा दोपहर में आराम कर रही होगी। तब उसे आश्चर्य होता की उस समय सुधा छत पर कपड़े तह करती हुई कपड़ों को फटकारती हुई मिलती।
जब वह रात को बिस्तर पर लेट कर कोई किताब पढ़ता होता तब वह चाहता कि अब उसके घर से आने वाली आवाजें बंद हो जाएं पर उस समय सुधा रसोई में उसके लिए गैस पर बादाम वाला दूध गर्म कर रही होती या उसके दवाई खाने के लिए गर्म पानी कर रही होती।
आज पूरा घर बिल्कुल निःशब्द था। कहीं कोई आवाजें नहीं है। सुधा को गुजरे पूरे पंद्रह दिन हो गए थे। आश्चर्य पिछले पच्चीस सालों से उसने इन आवाजों की कभी क़द्र नहीं की। सुधा उसके लिए एक साधारण स्त्री थी। जो उसके लिए खाना बनाती। उसके कपड़े धोती। उसका ध्यान रखती। बिल्कुल एक सेविका की तरह।
उसे आज महसूस हो रहा था कि सुधा को एक साधारण स्त्री समझना उसकी बहुत बड़ी भूल थी। घर में आने वाली जिन तमाम प्रकार की आवाजों को वह निरर्थक समझता रहा वह तो उसकी अभ्यर्थना थी। उसकी वंदना थी। वह बौखलाया सा पूरे घर में उन आवाजों को ढूंढने का प्रयास करने लगा।


डॉ. शैल चन्द्रा
रावण भाठा, नगरी
जिला- धमतरी
छत्तीसगढ़
मो.-9977834645