काव्य-प्रीति प्रवीण खरे

बिटिया

आगमन से बिटिया ने
मन को हर्षित कर डाला
सूने से इस आँगन में
रिश्तों की सज गई माला
किलकारी घर में गूंजी
शहनाई ने स्वर ढाला
टिम-टिम करती आंखों में
बस चमके, चंदा आला
धुँधले से हर सपने को
मिला है रूप निराला
बेरंग से इस जीवन को
सतरंगी कर डाला
हजारों जुगनू चमक उठे
जब पलकें खोलें ताला
किरणें जब-जब फैली हैं
मुस्कानें लायें उजाला
विधि लेखे पर इतराऊँ
लक्ष्मी बन आई बाला
आगमन से बिटिया ने
मन को हर्षित कर डाला

सरहद

मैं इधर रही जब बाँझ रही
जब उधर गई तो कोख फली
किस्मत आगे क्या किसकी चली
धूप छाँव की खेल भली
बिखरी बिखरी अपनी सूरत
आँख चुभन है दिल मे ंनफरत
कैसी है ये सबकी फितरत
मौन हुई है देखो कुदरत
सब जंजीरें लगती सरहद
घर में भी तो रहती सरहद
युगों युगों से मिलती सरहद
औरत की क्यूं बनती सरहद


प्रीतिप्रवीण खरे
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