कहानी-उड़ान -सनत सागर

उड़ान

’वाह! इतनी सुंदर कुर्सी! इसे देखकर ही मन खुशी से भर जा रहा है।’ कुर्सी पर यूं हाथ फिराया मानों वो उसकी महबूबा का हाथ हो। ’सुनो इस कुर्सी को सहेज कर रखना। ये तुम्हारे पिता की निशानी मात्र नहीं है बल्कि एक पुरातन वस्तु है। इस तरह की कुर्सियां आजकल कहां बनती हैं। लकड़ी में इस तरह की डिजाइन कहां बनते हैं। तुम इसे सुरक्षित रखना मेरे भाई! समझ रहे हो न!’ सागर ने योगेन्द्र के कंधे पर हाथ रखा कर जोर से दबाया।
योगेन्द्र अपने दोस्त की इस हरकत पर कसमसा सा गया पर प्रत्यक्षतः चुप ही रहा।
’अच्छा उन पुस्तकों का क्या हुआ जो तुम्हारे पिता पढ़ते थे। ढेर सारी पुस्तकें थीं। मैंने उनको हमेशा पुस्तकों में डूबा देखा था।’
सागर के प्रश्न पर योगेन्द्र चुप ही रहा। अब कहता भी तो क्या कहता। किराये का घर तो काफी बड़ा था, पर अपना घर भी तो जरूरी है। और इस जमाने में अपना होता ही कितना बड़ा है। अब अपने पुरानों की यादों को सहेज ले या फिर खुद और परिवार ढंग से रह ले। वैसे भी आजकल पुराने जमाने से कहीं ज्यादा परिग्रह भरा होता है घरों में। रेडियो, ग्रामोफोन, टेप रिकार्ड, पुराना ब्लैक एंड व्हाइट टीवी, नया कलर ठीवी और अब फ्लैट टीवी! सीडी प्लेयर, डेस्कटाप…क्या क्या गिना जाये। इसके अलावा तरह तरह के बेमतलब के गिफ्ट! वर्षगांठ और जन्मदिन में मिले हुये। कई बार तो लगता है कि लोग अपने घर का कचरा दूसरो को गिफ्ट में बांट देते हैं।
योगेन्द्र के सवाल और मेरे कठिन समय में भी ये विचार आते ही चेहरे पर मुस्कान आ ही गयी।
’मैं समझ गया तूने वो सब किलो भाव से बेच दिया होगा! तुझसे यही उम्मीद थी मुझे।’
ये कहता हुआ क्रोध से भरा हुआ सागर एकाएक उठा और योगेन्द्र के घर का दरवाजा खोल कर चला गया। और छोड़ गया एक सनसनाता सन्नाटा!
योगेन्द्र झट से दरवाजा बंद करके पंखें के नीचे गहरी सांस लेता हुआ पसर गया। सागर के आने से दिमाग में उथल पुथल मच गयी थी। उसे रह रह कर अपने पिता की याद आ रही थी। उसे भी अनुभव हो रहा था कि उसने अपने पिता की यादों के साथ न्याय नहीं किया।
’और उस राजा ने अपनी प्रजा की भलाई के लिये अपना सबकुछ दान दे दिया।’
पिता के हाथ में फंसी कहानी की वो पुस्तक दिखायी दे रही थी जिससे वे राजा वाली कहानी सुना रहे थे।
काले फ्रेम का वो चश्मा, उनकी नीली पेन, और उनकी दाढ़ी बनाने वाली रेजर, जाने कितने दिनों तक यहां वहां कार्टूनों में रखे रहे। दूसरी मंजिल का ये घर खरीदने के बाद जाने कितने दिनों तक क्या रखें, क्या न रखें, इस पर ही हम पति पत्नी की चर्चा होती रहती।
बच्चों की पढ़ाई की टेबल, उनके सोने के कमरे और एक बेडरूम के बाद बहुत कुछ था जिसे बेमन से अलग किया था। पापा को पुस्तकों के अलावा एक शौक और था जो मेरे अलावा कोई नहीं जानता था।’
अचानक ये सोचता हुआ योगेन्द्र झटके से उठ बैठा। और भीतर से एक कार्टून उठा लाया। पिता जी की डायरियां थीं उसमें। और उन डायरियों में उनकी लिखी कहानियां कविताएं सुंदर अक्षरों में सुसज्जित थीं।
’सुनो जी! सोना नहीं है क्या ? बारह से ज्यादा हो गये हैं। जब देखो तक पापा की चीजों को निकाल कर आखिर उसमें क्या खोजते रहते हो।’ अंजना ने उबासी लेते हुये कहा। ’चलो अब सो जाओ। तुम आ रहे हो तो ठीक वरना मैं तो चली सोने।’
योगेन्द्र आश्चर्य से भरा अंजना का मुंह देख रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अभी कुछ समय पहले उसके दोस्त ने अपने पिता को भूला देने का ताना मारा था और ये अंजना, उसे पिता की यादों में पागल साबित कर रही है। वास्तव में सच है तो क्या ?
डायरी के बीच से नीली पेन झांक रही थी। मानों चुपके से मुस्करा रही हो। योगेन्द्र ने झट से दीवार पर टंगी पिता की तस्वीर की ओर देखा। बुढ़ापे के सारे चिन्हों से सुसज्जित पिता मुस्करा रहे थे।
डायरी बंद कर वापस कार्टून में रखा और हाथ पांव धोकर सोने चला गया।

’अरे! योगेन्द्र! वो निवाड़ वाली खाट, फेंकने से अच्छा विनोद को दे देना। उस बेचारे के घर के सब लोग जमीन पर ही सोते हैं। और दादाजी वाली दोनों कुर्सियां भी उसके यहां छोड़ देना। अपने यहां तो सब धूल खाती पड़ी हैं। ये प्लास्टिक की कुर्सियां अच्छी हैं, कहीं भी उठा कर ले जाओ और कहीं पर भी रख दो। देखने में भी सुंदर। सबसे बड़ी बात, फैशन इसका ही चल रहा है।’
योगेन्द्र उठ कर बैठ गया। अंधेरे में इधर उधर देखने लगा। गहरी नींद से उठा था। अपने पिता बातें सपने में सुनकर! अंजना भी उठ गयी थी, योगेन्द्र के झटके से उठने के कारण पलंग जोर से हिला जो था।
’अब तुम रातों को भी परेशान करोगे!’ वह चिढ़ कर बोली। ’सुबह पांच बजे उठना है मुझे बच्चों के लिये खाना बनाकर स्कूल भेजना है। तुम्हारी तरह नौ बजे तक मुझे सोने नहीं मिलता है। सो जाओ चुपचाप।’ इतना कहकर जवाब की प्रतीक्षा के बिना ही वह पुनः सो गयी।
योगेन्द्र शांत पड़ा पड़ा जाने क्या क्या सोचता रहा।
चांद आसमान में न था उसका साथ देने के लिये। और जो साथ थी वह उसके साथ न थी।

’तू मेरे घर से क्यो निकल गया झटके से एकाएक! पता है तुझे तेरे इस तरह चले जाने से घर में अंजना ने कितनी बातें मुझे सुनाईं।’ योगेन्द्र सागर के पास बैठते बैठते ही पूछा।
’तू है ही उसी लायक। जो अपने पिता का न हुआ वो किसी और का कैसे होगा। तेरे से दोस्ती करना ही बेकार है।’ ऐसा कह कर सागर अपने लैपटॉप को ऑन करके कुछ टाइप करने लगा।
योगेन्द्र ने उसकी बेरूखी को समझने के बाद भी अपना मन खराब नहीं किया। उसकी बगल में बैठ कर देखने लगा कि आखिर सागर लैपटॉप पर कर क्या रहा है ?
सागर कुछ टाइप कर रहा था। योगेन्द्र से ध्यान से देखा।
’बांध के डूबान क्षेत्र में जो जो गांव आ रहे हैं उनको तो कहीं और बसा दिया जायेगा। पर क्या वहां के लोगों के पूजागृहों को, उनके श्मशान घाट को, उनके दादा परदादाओं द्वारा लगाये गये पेड़ों की यादों को किस तरह दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है ? वहां के पत्थरों, पहाड़ियों और वनक्षेत्र में फैली उनकी स्मृतियों को किस तरह स्थानान्तरित किया जा सकता है ?
लोगों को दूसरे स्थान पर बसा कर हम एक सभ्यता को नष्ट करने का अक्षम्य प्रयास नहीं कर रहे हैं ? उस क्षेत्र की आदिम संस्कृति को उनकी धरोहरों को, उनकी पूजन पद्धति को, उनके देवी देवताओं को हम नष्ट करके आखिर विकास की कैसी इमारत बनाना चाहते हैं ? ऐसी इमारत जिसकी नींव में एक पूरी संस्कृति, पूरे संस्कार, पूरा इतिहास ही दब जाये!
नहीं चाहिये ऐसा विकास! किसी के विनाश के एवज में विकास नहीं चाहिये।’
खटाखट इतना लिखने के बाद सागर की उंगलियां रूक सी गयीं थीं। वह सोच में डूबा दिखायी पड़ रहा था। योगेन्द्र ने उसे कनखियों से देखा। वो गहरी सोच में डूब गया था, ऐसा अनुभव होता था मानों उसकी उपस्थिति से भी वो अनभिज्ञ हो। लगभग आठ नौ मिनट यूं ही सोचता रहा। फिर एकाएक उसकी उंगलियां पुनः लैपटाप के की बोर्ड पर मचलने लगीं।
’सरकारें बहरी होती हैं। उनके कान में अगर नगाड़ा बजाया जाये तब ही वे सुन पाती हैं। हड़तालों का क्या असर हुआ सबको पता है। रास्ता रोको अभियान भी किसी काम न आया। धरना प्रदर्शन सबकुछ सिर्फ कहानियां हैं। अब हमें नवीन प्रयोग करने होंगे। नवीन एकदम नवीन प्रयोग! इन्हीं नवीन प्रयोगों से ही सरकार के बंद कान खुलेंगे और बंद आंखें भी।
पहले पत्थर से ही शेर भाग जाते थे अब तो राकेट लांचर देखते हैं, तब ही अपनी दुम कुत्ते की तरह अपने नीचे लेकर आते हैं।
खैर! हमारे प्रयास कमतर नहीं होने चाहिये। हमें बचानी है एक पुरातन सभ्यता, एक पुरातन जीवन शैली और एक पुराने देवी देवताओं का समूह!’
इसके बाद वह पेज सेव करने का बटन दबाया और लैपटॉप का ढक्कन बंद कर दिया।
इसके बाद वह योगेन्द्र की आंखों में झांक कर आत्मविश्वासपूर्वक देखने लगा। योगेन्द्र अचकचा गया उसकी इस हरकत पर। फिर खुद को संयत करके पूछा।
’तू कबसे कागज कलम के स्थान पर लैपटॉप में उंगलियां रगड़ने लगा है ?
’यही तो प्रगतिशीलता है। नये जमाने की नयी चीजों को, विज्ञान के नवीन आविस्कारों को अपनाना! पुराने पोंगा पंडित थोड़े ही बने रहना है हमें। देख दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी और हमारा देश आज भी अठारहवीं शताब्दी में जी रहा है। आज भी लोगों के पास ढंग के कपड़े, भरपेट भोजन ओर सर ढंकने को झोपड़ी भी नहीं है। आज भी सड़कें नहीं हैं, लोगों के घरों में बिजली नहीं है।’
इतना कहकर कुछ पलों को रूका और फिर बंद आंखों से अंधेरे से कुछ शब्दों को चुनकर लाया।
’ओर दूसरी ओर देखो, लोगों के घरों में ठण्ड में भी एसी चल रहा है। गर्मी में भी गर्म पानी से नहाने के लिये गीजर लगा है। ये सामाजिक दोहरापन…..बल्कि दोगलापन कहना उचित होगा। कोई देखना ही नहीं चाहता गरीबों की ओर, वंचितों ंकी ओर!’
ये कहते हुये उसके हाथ की उंगलियां मुड़ कर मुट्टी का रूप लेकर टेबल पर धड़ से पड़ चुकी थीं। उसकी आंखों में खून से भरी नसें सांप की तरह अठखेलियां कर रहीं थीं।
योगेन्द्र ने उसे इस हाल में देखकर बात बदलने के भाव से कहा।
’चलो चाय पीकर आते हैं!’
सागर उसकी बात सुनकर मानों दूसरी दुनिया से वापस आया हो। उसकी ओर कुछ पलों तक देखता रहा। फिर बोला।
’गर्मी बहुत है, कुछ ठण्डा पीते हैं। होटल के एसी में कुछ ठण्डक भी मिल जायेगी मुफ्त की।’ कहकर झट से चल भी पड़ा। योगेन्द्र उसके पीछे हो लिया।
’मुझे भूख लग रही है समोसा मंगा लू दो प्लेट ?’
’नहीं, इस रेस्टोरेंट का पिज्जा भारी फेमस है। मैंने भी कई बार खाया है मन ही नहीं भरता। भले ही एक मंगा लो!’ सागर ने एक ही पल में हां, नहीं और पसंद नापसंद का लफड़ा ही खत्म कर दिया।
अपनी जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगा लिया। ’यहां इसका भी आनंद उठाने मिल जाते हैं। अब बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद! तू अगर सिगरेट पीता तो समझ आता कि कितना मजा आता है इसकी गंध में। इसकी गंध ही आदमी को अपना गुलाम बना लेती है, और स्वाद तो फिर जर खरीद गुलाम बना लेता है।’ दो कश के बाद सिगरेट के मुंह में पैदा हुयी राख को टेबल पर पड़े के कांच के गिलास में झाड़ता हुआ सागर लगातार रूक रूक कर बोल रहा था।
’अच्छा! ये जो लिख रहा था, वो कहां के लिये लिख रहा था ? कहां बन रहा है बांध ? कहां डूब रही है बस्ती ?’ योगेन्द्र ने सारे सवाल एक साथ रख दिये सागर के सामने पिज्जा आने के पहले ही सबकुछ जान लेना चाह रहा था।
प्रत्युत्तर में सागर ने उसकी आंखों में गहराई तक उतर कर कुछ समझना चाहा और शायद आश्वस्त हो गया तब बोलना शुरू किया।
लगातार धाराप्रवाह बताता हुआ सबकुछ कुछ ही मिनटों में समझा दिया। उसकी बातें सुनकर योगेन्द्र उसे ही देखता रहा। मानो उसके भीतर से होकर ही वे सारी घटनाएं गुजर रही हों।
’ये पिज्जा बन रहा है कि बीरबल की खिचड़ी! अब तक नहीं आया।’ सागर बेचैनी से अपनी बैठक की करवट बदलता हुआ बोला। इस हरकत से ही योगेन्द्र अपने विचारों से बाहर निकला।
’पर हम भी तो बिजली का उपयोग करते हैं, ये बिजली भी किसी बांध के पानी से बन रही होगी, तब! बांध से नहीं बन रही होगी तो कोयले से बन रही होगी। ये प्लांट भी किसी न किसी जगह लगे होंगे, कोयला भी खोदने के लिये सरकार ने जगह को उजाड़ा होगा! अपराधबोध का एक अंश भी अनुभव नहीं होता। बल्कि कहीं से याद भी तो नहीं आता! न जाने कितने ही गांवों को उजाड़ने में संस्कृतियों को मटियामेट करने में हमारा अदृश्य हाथ है।’ योगेन्द्र लगातार बोलता जा रहा था। सागर उसकी ओर देखकर मुस्कराता रहा।
’दो दिन बाद मीटिंग है मुम्बई में, इसी विषय पर बोलना है। उसकी ही तैयारी कर रहा हूं मैं। भाई! मैं जो हूं वही हूं। मेरे व्यवहार मेरे व्यक्तित्व में कहीं भी दुहराव नहीं मिलेगा। मैं जैसा कहता हूं वैसा ही करता भी हूं। मैं आजीवन अपने उद्देश्य के लिये लोगों से सरकार से और विचारों से भिड़ता ही रहूंगा……चाहे इसके लिये मुझे अपने से भी दूरी बनानी पड़े।’
सागर की बातें थीं या फिर पिज्जा का उसी वक्त आना, बातें बंद हो गयीं और मात्र चपड़ चपड़ की आवाजें ही रह गयीं।
’पर तुम परसों मुम्बई पहुंचोगे कैसे ? ट्रेन में इतनी जल्दी रिजर्वेशन भी कहां मिलता है।’ योगेन्द्र अपने मंुह का पिज्जा लगभग निगलता हुआ एकाएक पूछ बैठा।
’अरे भाई! तुम किस दुनिया में जीते हो। हमारे शहर से इंदौर होते हुये मुम्बई की फ्लाइट हफ्ते में तीन दिन है। उससे ही जाउंगा और क्या! यार! जरा धंधे पानी से बाहर निकलो, दुनियादारी भी सीखो। ये क्या अपनी दुनिया में ही घुसे रहते हो हरदम!’ सागर अपना मंुह पेपर नेपकीन से दोबारा पोंछता हुआ बोला। ’ये जिन्दगी भी क्या जिन्दगी है लल्लू! देश दुनिया समाज के लिये भी जीना सीखो।’
’हां, भाई! जरूर! तुम्हारे साथ रहकर जरूर सीख ही जाउंगा….भले ही जरा देर लगे!’ मुस्करा कर योगेन्द्र ने हा और जेब से पांच सौ का नोट निकाल कर प्लेट पर रख दिया।

’क्या बात है आजकल आपको खाना नहीं भाता है ? तबीयत तो ठीक है न!’ एकदम से योगेन्द्र का हाथ पकड़कर अंजना ने क्षणभर में ही चेक भी कर लिया।
’अरे! मैं कौन सा रोज खाना नहीं खाता हूं। अजीब बात करती हो। आज ही तो सागर के संग होटल में पिज्जा खा लिया था इसलिये पेट भारी सा लग रहा है। एक दिन वो भी एक समय भोजन न करने से इतनी बड़ी बात गढ़ ली। सच तुम तो महान हो।’ योगेन्द्र हंसता हुआ बोला।
’लो तुम तो पार्टी सार्टी करके आ रहे हो और हम यहां चिन्ता में मरे जा रहे हैं। आखिर किस खुशी में पार्टी दी गयी थी हम भी तो जाने।’ अचानक बात का रूख फिर बदल गया।
योगेन्द्र विस्तार से सबकुछ बताता गया। अंजना बीच बीच में हां हूं करती रही। योगेन्द्र बीच बीच में पल दो पल रूक कर उसकी ओर देखकर समझने की कोशिश करता कि वो आखिर समझ भी रही है या नहीं। पर योगेन्द्र खुद ही कनफ्यूजन में आ जाता। आखिकार उसकी बात खत्म हुयी। जैसे ही बात खत्म हुयी अंजना ने झट से कहा।
’तुम्हारा दोस्त तो बड़ा ही शातिर है। खुद के लिये हवाई जहाज, लैपटाप और गांव वालों के लिये वहीं मंदिर और संस्कार की दुहाई। सच जाने कितने मक्कार मरे होंगे तब तुम्हारा दोस्त जन्मा होगा।’ यह कहती हुई अंजना हंसने लगी।
अंजना की बात सुनकर योगेन्द्र का मुंह खुला का खुला रह गया। वह समझ ही नहीं पाया कि सदैव शांत रहने वाली अंजना इतनी बड़ी बात इतनी आसानी से कैसे कह दी। सागर चाहे कैसा भी हो पर इस तरह की मानसिकता का मालिक नहीं हो सकता। अंजना के विचार उसे सहजता से पच नहीं रहे थे। सागर की चिन्ता तो सही है। अगर हम आज उन विस्थापितों के साथ नहीं खड़े होंगे तो कल के दिन हम पर विपत्ति आने पर कौन खड़ा होगा। कल के दिन नजूल की जगह में अवैध कब्जे वाला हमारा ही घर द्वार तोड़ने के लिये सरकार कह दे तब….तब हम क्या करेंगे ? कौन हमारे साथ खड़ा होगा।
योगेन्द्र परेशान हो उठा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो उन बांध वालों के दुखों के साथ कैसे जुड़ गया है। वह खाने से निवृत्त होकर अपने पिता के कार्टून को उठाकर बेडरूम में चला गया। उसे खोलकर पिता की डायरी खोल कर पन्ने उलट पलट करने लगा। शायद कुछ खोज रहा था।
आखिरकार एक पन्ने पर रूक गया। ध्यान से पढ़ना शुरू किया।
पृथ्वी गोल है
गोल पृथ्वी पर
सबकुछ घूमता है
स्थिर कुछ नहीं,
समय की तरह!
जो आज दिख रहा है
वो पहले कुछ और था,
पहले मिट्टी ही थी
वो मटकी भी,
फूटकर फिर मिट्टी हो गयी।
जो नगर बसे हैं
पहले गांव थे,
और गांव थे
घने वन!
घने वन
जहां बहती है
निसंकोच
बेधड़क,
सहज नदियां!
ये नदियां भी बहती थीं
कभी और कहीं!
जितने भी बदलाव हुये थे
वे सारे के सारे बदल गये,
पर न रूका मानव
और न रूकी प्रकृति,
समय के साथ बदलते रहे
दोनों,
दोनों थे प्रगतिशील,
दोनों थे प्रगतिशील!
मात्र एक समय था
मौन दृष्टा!
धरती में समाये
पदचिन्हों के साथ!
एक बार और, एक बार और पढ़ता हुआ योगेन्द्र अपलक देखता रहा उन पन्नों को, और सहलाता रहा उन पन्नों को।
’’क्यों आज भी रात काली करने का इरादा है क्या ?’’ अंजना ने बिस्तर पर खुद को पटकते हुये उनींदी आवाज में पूछा।
योगेन्द्र मुस्करा उठा। धीरे से बुदबुदाया।
’आज तो खर्राटों में डूब कर सोने की रात है।’’
और डायरी को सीने से लगा कर वापस उसी कार्टून में रख दिया।

सनत सागर