गुड़दुम-पाठकों से रूबरू-अंक-1-भाषा बोली का संकट

भाषा बोली का संकट

ये संकट एक ऐसा संकट है जो इस सदी का धरातलीय सत्य है जिसका आना सौ प्रतिशत सुनिश्चित है।
इस युग के कुछ सत्य हैं जो घटित होने ही हैं चाहे आप जितनी भी चिन्ता व्यक्त कर लें, चाहें आप जितना हाथ पैर मार लें ये सबकुछ होना ही है। जैसे कि संस्कृति में बदलाव, रहन सहन में आमूल चूल बदलाव, सोच में बदलाव, खान पान में बदलाव और भाषा बोली में बदलाव!
न तो ये बदलाव बदले जा सकते हैं न ही रोके जा सकते हैं। हां आप चाहें तो इसको रोकने का अटूट प्रयास करते हुये खुद को हीरो समझ सकते हैं। यहां कुछ अति आशावादी कह सकते हैं कि हम यूं ही हार नहीं मान सकते न ही हम यूं ही समर्पण कर सकते हैं। हमें अपनी जीवटता जरूर दिखानी होगी।
सच है ये बात!
पर क्या हम ये देख नहीं रहे हैं या अनुभव नहीं कर रहे हैं कि उपरोक्त बिन्दुुओं में दुनिया बदल सी गयी है हमारे ही जीवनकाल में बल्कि लगभग बीस पच्चीस बरस में। विकास का मतलब है दुनिया की बदलाव की गंगा में खुद को छोड़ देना। ज्यादातर सफल व्यक्ति हमारे आसपास इसी तरह के ही नजर आते हैं। हां, ये अलग बात है कि हम इस मुगालते में ही जीयें कि दुनिया नहीं बदलेगी। दुनिया आगे बढ़ जायेगी और हम वहीं के वहीं।
इन बातों का दुखद पहलू यह है कि इस द्वंद की चक्की में सिर्फ गांव पिस रहा है। वहां के लोग आज भी अपने विकास की राह जोह रहे हैं। उनके रहनुमा बने बड़े बड़े मोटे मोटे आंसू बहाने वाले लोग मोट बनते जा रहे हैं उनकी तिजोरियां अधिक भोजन के चक्कर में उलटी कर रही हैं।
तो क्या हम विकास की इस रेलमपेल में स्वयं को छोड़ दें ? खुद को बगैर श्रम, जीवटता के बहने दें ?
नहीं कदापि नहीं! मनुष्य का मतलब ही है प्रगतिशील होना। अगर मनुष्य प्रगतिशील न होता तो पाषाणयुग से इस जेटयुग में कैसे आता। मानव की प्रगतिशीलता ने ही मानव को खोजी प्रवृत्ति का बनाया है तो वह चुपचाप तो नहीं बैठ सकता। वह खोजता रहेगा सारी दुनिया को या फिर खुद को। मानव की खोजी प्रवृत्ति से जो ज्ञानोपर्जान होता है वही उसकी उपलब्धि है शेष सबकुछ माध्यम है।
अतः ज्ञान पर स्वयं को केन्द्रित करना ही इस समस्या का उपाय है।
अगर हम अपने ज्ञान को अपनी भाषा बोली और जीवन में उतारेंगे और वह दुनिया की वर्तमान आवश्यकता की जरूरत का होगा तो कोई माई का लाल हमारे रीति रिवाज, संस्कार को बदलने में असमर्थ होगा। वरना विकास के यज्ञ में समिधा बन कर सबकुछ को नष्ट होना ही है।
ज्यादातर लोकजीवन और लोकबोलियों को लेखकों ने मनोरंजन के रूप में ही दुनिया के समक्ष परोसा है। जैसा परोसा है वैसी ही दुनिया ने प्रतिक्रिया दी है। हमने कभी अपने लोकजीवन के चिंतन को दुनिया के समक्ष नहीं रखा। क्या हमारे लोकजीवन में चिंतन नहीं है ? अध्यात्म नहीं है ? वैज्ञानिकता नहीं है ?
हिन्दी और संस्कृत में भी इस दौर ने संकट पैदा किये। परन्तु जब भाषा ने अपनी दमदारी अपने ज्ञान के साथ दुनिया के समक्ष रखी तब जाकर दुनिया आज नतमस्तक है।
क्या लोकसाहित्यकारों को अपने लेखन में मात्र कुकड़ी, सुकसी, कुकूर, मद, बैगा से आगे नहीं बढ़ना चाहिये ? साहित्यलेखन क्या मात्र काव्यलेखन ही होता है ? क्या आदिम संस्कृति का पहनावा ओढ़ावा ही उसकी विशेषता होती है ?
क्या किसी लोकजीवन में उनकी कुछ विशिष्टता नहीं होती है ? नाचना गाना ही विशिष्टता है ? उनके समाज का कोई समाजशास्त्रीय अवदान नहीं होता है ? हम क्यों नहीं उन सबको आगे बढ़ाते हैं ? क्यों नहीं अपने लेखन में ऐसे विषयों को बार उठाते हैं ? अपनी कविताओं में नदी, तालाब, झाड़ पेड़, कुत्ते, मछली आदि से आगे नहीं बढ़ते हैं ?
दुनिया में जिस तरह कविताओं में प्रयोग किये जा रहे हैं वैसे प्रयोग अपनी लोकबोली में क्यों नहीं करते ? उस तरह के विषय क्यों नही लेते ?
हम क्यों लोकबोली के लेखन का मतलब सिर्फ पहनावे और ढोल बाजे तक ही मान कर चलते हैं ? तमाम सरकारी पैसों से चलने वाली संस्थाएं सिर्फ लोकबोली के संरक्षण के नाम पर अपने परिवार का संरक्षण करती दिखती हैं ?
वहुत से लेखक जो लोकबोली लेखन के स्थापित लेखक माने जाते हैं उनका साहित्यिक अवदान क्या है ? मेवायुक्त सरकारी पद, सरकारी धन का गबन और सराकरी सुखसुविधायुक्त वातावरण में रह रह कर लोकसंरक्षण की गंदी डकार!
इस आपाधापी वाले दौर में कुछ तथाकथित नाम तो बगैर योगदान के ही स्वर्णपट्ट में अंकित कर दिये गये हैं। हर गोष्ठी के मुख्य अतिथि, संबोधन में ’जाने माने, बड़े कवि, जानकार!’!
इन्हीं तथाकथित बड़े नामों ने अपने योगदान की समीक्षा न हो इसलिये नये लोगों के लिये मार्ग अवरूद्ध कर रखा है। उनके शोधात्मक लेखन में एक ही विषय पर लगभग सभी लेखकों ने कलम चला कर दावा किया है कि यह उनको शोध है। इस लेखक की विषयवस्तु लोकबोली के अक्षरों की है। कुछ लोगों ने हल्बी या हलबी पर कलम चलायी है। कुछेक तो वाद्य यंत्र, पहनावे और मद की आवश्कता साबित करने से आगे नहीं बढ़ पाये हैं।
ज्यादातर शोध आलेख यथार्थ से परे, धरातलीय सत्य से दूर हैं। पुराने शोध आलेखों की बदली शब्दावली मात्र है। और लगभग सभी आलेख आजादी के समय के अंग्रेज मिशनरी वेरीयर एल्विन के लिखे शोध आलेख से लिये गये हैं। न तो उनके पहले न ही उनके बाद किसी ने प्रमाणिक रूप से शोध कार्य किया है।
दुखांत यह है कि आज भी यही चल रहा है। किसी की रूचि ही नहीं है कि जमीनी हकीकत दुनिया के सामने रखी जाये। एक अंग्रेजी भाषी ने गांव में आकर गांव की बोली सीख ली। उस दौर में जब कुछ भी आसान न था। उस युग में आदिम जीवन पर एक ऐतिहासिक पुस्तक लिख कर उनके ही समाज के लिये मूलग्रंथ लिख गया। और कभी कभी ऐसा लगता है कि उसे ही मौलिक ग्रंथ मान लिया गया है उन लोगों द्वारा भी।
तब तो कोई ऐसा व्यक्ति ही नजर नहीं आता जो उस इतिहास की समीक्षा कर सके जिसे उस व्यक्ति ने लिखा था जो इस क्षेत्र में अपने मिशनरी कार्य से आया था। क्या हम मान सकते हैं कि उसने अपने कार्य के प्रति ईमानदारी रखी होगी। क्या उसने अपने फायदे या अपनी संस्था के लंबे समय तक फायदे के लिये मूल बातों को अपने हिसाब से नहीं रचा होगा। कई मनगढंत बातें जोड़ी होंगी तो कुछ वास्तविक बातों का उल्लेख नहीं किया होगा।
और मजे की बात यह है कि हमारे तथाकथित बड़े स्थापित साहित्यकार सिरहा गुनिया, लांदा और सल्फी से बाहर ही न निकलने की कसम खा रखी है। जाने कब उनकी देशी दारू का नशा उतरेगा।
कुछ तो महुआ की शराब को संस्कृति से जोड़ने पर उतारू हैं। भले ही उनका लिखित ’शोध आलेख’ न मिले पर भाषणबाजी सुनने को मिलती रहेगी। आदिम संस्कृति को एक नये दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है न कि सरकारी कार्य की तरह निपटाने की, खानापूर्ति करने की जरूरत है।
हर त्यौहार रीति रिवाज के भौतिक वर्णन से वाहवाही लूटने की जगह उनके वास्तविक महत्व को समझने की जरूरत है।
जाने कब तंद्रा टूटेगी।

सनत कुमार जैन
मो.-9425507942