लघुकथाएं -बाल कृष्ण गुप्ता गुरु

दमित इच्छा

कमली की तबीयत ठीक नहीं थी। काम ते सहयोग के लिए मुनिया को स्कूल न भेज कर अपने साथ लेकर मालिक के यहां आई थी। मुनिया को किचन के डिब्बों को पोंछकर रखने के लिए कहकर वह झाडू पोंछा बर्तन करने लग गई थी।
किचन के सामने से गुजरते हुए दिनेश की नजर काजू के डिब्बे के ढक्कन लगाती मुनिया पर पड़ी। रंगे हाथ पकड़ने की इच्छा से वहीं किनारे खड़े हो गये। मुनिया ने इधर-उधर देखा, फिर बादाम के डिब्बे को हाथ में लेकर बाहर साफ करने के बाद, ढक्कन खोलकर देखने लगी। दो मिनट तक वह देखती रही। फिर ढक्कन बंद करके ठीक उसी स्थान पर रख दिया। वैसा ही उसने किशमिश, चिरौंजी आदि मेवे के डिब्बों का भी किया। अंतिम डिब्बे का ढक्कन लगाते दिनेश की भारी आवाज मुनिया के कानों में टकराई-’’मुनिया।’’
उसके हाथ से डिब्बा गिरते गिरते बचा। वह डरते डरते मालिक के सामने आ खड़ी हुई। दिनेश ने पूछा-’’सच सच बताना, तुमने कितना काजू निकाला था ?’’
इतनी देर में कमली भी आ गई। सुनते ही उसने कहा-’’मालिक हम लोगों की इतनी भी औकात नहीं है कि चोरी करके मालिक के मेवे मिष्ठान खा सकें। मुनिया मेरी बेटी है, मैं उसे अच्छी तरह से जानती हूं।’’ इतना कह कर मुनिया को लेकर अपने घर आ गई।
मालिक का व्यवहार उसे अच्छा नहीं लगा। आते ही मुनिया को झापड़ लगाकर पूछा-’’सच सच बता, मालिक ने उसे क्या करते हुए देखा था ?’’
मुनिया ने सच सच बता दिया। कमली ने एक लम्बी सांस ली।

स्तर का सवाल

फेसबुक में एक समाचार वाइरल हो गया -’’नगरनिगम के एक बड़े अधिकारी ने एक व्यक्ति से उसके घर के सामने की नाली साफ करवाने के लिए सौ रूपये की रिश्वत ली।’’ जनता से ढेरों लाइक्स के साथ कमेंट भी आने लगे। थू-थू। सफाई व्यवस्था के ढोल में पोल। नाली की सफाई के बहाने जेब की सफाई। भ्रष्टाचार में मंहगाई बेअसर आदि आदि। नगर निगम के अधिकारियों के संघ के अध्यक्ष ने कमेंट किया- ’’उसका स्तर इतना गिर गया है कि अब उन्हें संघ से ऐसे निकाला जायेगा, जैसे नाली से गंदगी निकाली गई।’’नगरीय मंत्री ने कमेंट किया-’’जांच करवाता हूं।’’ कुछ देर बाद उस अधिकारी का रोते हुए चेहरे का वीडियो भी वाइरलहो गया। एक शुभचिंतक ने पूछा-’’ऐसे कैसे हो गया ? मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता।’’
अधिकारी ने कहा-’’मैं भी मात्र सौ रूपये लेने की बात सपने में भी नहीं सोच सकता। अपने स्तर और सम्मान से समझौता करना भूलकर भी नहीं सोचूंगा। न हजार से कम लिया है न ही लूंगा। इल्जाम के घटिया स्तर के कारण रो पड़ा। अब तुम ही बताओ, सौ रूपये की रिश्वत लेने वाली बात भी कोई समाचार है ? यह दैनिक समाचार पत्र में तो क्या, लोकल साप्ताहिक में भी नहीं छपेगा।’’

सत्य से साक्षात्कार

सरकारी स्कूल के विज्ञान के शिक्षक ने पाचन तंत्र पढ़ाते हुए समझाया-’’खाना खाते समय या खाने के आधे घंटे के भीतर पानी पीना जहर के समान होता है। इससे काइम ठीक तरह से नहीं बन पाता, जिससे पाचन खराब हो जाता है।’’
अपने स्थान पर खड़े होकर रिक्शे वाले का बेटा सुखिया ने कहा-’’माफ कीजिएगा सर! आपकी बात आधी सही है। हम गरीबों का पेट तो थोड़ा खाकर ढेर सारा पानी पीकर ही भरता है। पाचन भी ठीक रहता है। नींद भी अच्छी आती है। बड़े आदमियों के लिए यह बात ठीक हो सकती है। जिनका पेट अकसर खराब रहता है। इसके कारण उन्हें अच्छी नींद नहीं आती, नींद की गोलियां खाते हैं।’’
शिक्षक ठीक है, कह नहीं सकता था। मात्र सोच सकता था-’’थ्योरी और प्रेक्टिकल में कितना अंतर हो रहा है।’’
सुखिया सोच रहा था-’’मैंने जो अंतर बताया, वह कितना सत्य है ?’’
दोनों सोच रहे थे-’’विकास की बातें होती है, पर वास्तव में कितना सत्य है ?’’
शिक्षक ने जब यह बात प्राचार्य को बताई तब प्र्राचार्य सोचने लगा-’’सुखिया जैसे बच्चे दिमाग से ज्यादा पेट से सोचते हैं।’’

बालकृष्ण गुप्ता ’गुरू’
डॉ. बख्शी मार्ग, खैरागढ़ (छ.ग.)
मो.-9424111454