व्यंग्य-डॉ बी प्रकाश मूर्ती “पैमाना”

कराओके कुमार जी का कोहराम 
हमारे एक पड़ोसी हैं कराओके कुमार जी इनके अनुसार इनमें गायकी का हुनर इनके पैदा होते ही दिख गया था, कराओके कुमार जी बताते हैं कि जब वे पैदा होकर पहली बार रोये तो डिलीवरी रूम में मौजूद सभी लोग हतप्रद हो गए थे ,एक ने कहा इतना छोटा बच्चा इतने पक्के सुर में कैसे रो सकता है ? जरूर ये पिछले जन्म में कोई बड़ा गायक रहा होगा,डिलीवरी रूम में मौजूद सभी लोगों ने सहमति से अपना सिर हिलाया,उनको मेरा रोना इतना पसंद आ रहा था कि वे सभी मेरे चुप हो जाने के बाद मुझे बार बार चूंटी काट कर रुला रहे थे ,एक ने तो मेरे रोने की रिदम में एक फिल्मी गाना पहचान लिया था गाने के बोल थे ” अरे दीवानों मुझे पहचानो मै हूँ कौन ….”खैर बचपन के शुरुवाती दिनों में कराओके कुमार जी के गाने के प्रति शौक को मुहल्ले वालों ने भी पहचान लिया था आए दिन किसी के जन्म दिन पर या घर पर मिलने आए मेहमानों के सामने उन्हें गाने को बोल दिया जाता था उनकी तोतली जबान और अनोखी आवाज़ से निकले गानों के बोल सुनकर लोग खूब आनंद उठाते थे, बकौल कराओके कुमार जी शास्त्रीय संगीत को छोड़ कर वे लगभग सभी फिल्मी गायकों के गानों को गा लेते हैं , के एल सहगल से लेकर अर्जित सिंग तक के सभी गायकों के गानों को वे गा चुके हैं ,कई बार इन गायकों की गायकी में कराओके कुमार जी ने कमियां भी निकाली ,कराओके कुमार जी को सुनने वाले शुभचिंतक श्रोताओं ने उनके और सबके भले के लिए “ इन्हें गायकी छोड़ कर कोई और काम करना चाहिए “,की सलाह दी थी पर कराओके कुमार जी नहीं माने, एक बार कराओके कुमार जी के कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यक्रम में गायकों का चयन आर्केस्ट्रा टीम द्वारा किया जाना था जिसके लिए कराओके कुमार जी के साथ साथ कई अन्य विद्यार्थीयों ने भी ऑडिशन दिया लेकिन विडंबना ये कि कराओके कुमार जी को छोड़कर बाकी सभी विद्यार्थीयों का चयन आर्केस्ट्रा टीम ने कर लिया कारण पूछने पर आर्केस्ट्रा टीम ने स्पष्ट बताया कि इनका सुर और ताल से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है,इनकी आवाज सुनकर ऐसा लगता है जैसे मानो किसी ने कानों में गर्म लोहा पिघला के डाल दिया हो ,माफ़ कीजिए हमने बहुत कोशिश की, गाने के अनुसार भी और कराओके कुमार जी के गाये अनुसार भी, पर हम इनके लिए किसी भी गाने में गाने का आर्केस्ट्रा सेट करने में सफल नहीं हो पाए , आर्केस्ट्रा टीम ने भी कराओके कुमार जी के शुभ चिंतको की तरह सलाह दी कि “ इन्हें गायकी छोड़ कर कोई और काम करना चाहिए “,पर कराओके कुमार जी कहाँ मानने वाले थे उन्हें अपनी नैसर्गिक प्रतिभा पर पूरा यकीन था लेकिन उस दिन के बाद कराओके कुमार जी और आर्केस्ट्रा टीम के बीच” 36 का आंकड़ा बैठ गया “ कराओके कुमार जी का सपना था की वे अपनी गायकी के कैरियर की शुरुवात किसी आर्केस्ट्रा टीम के साथ शुरू करेंगे पर “ होनी को कुछ और ही मंजूर था “ उनका वो “सपना धरा का धरा रह गया ” पर कराओके कुमार जी कहाँ हार मानने वाले थे ? उन्होंने अपने गायकी के अपमान को चुनौती के रूप में लिया और अपने सुर को साधने के लिए गायकी की कोचिंग क्लासेज भी ज्वाइन की सभी जगह नतीजा एक ही निकला सिखाने वालों ने अपने “ दोनों हाँथ खड़े कर दिए “ और कराओके कुमार जी से माफ़ी मांग ली और कराओके कुमार जी को वही सलाह दे डाली जो अब तक कराओके कुमार जी को सभी देते आ रहे थे की “ इन्हें गायकी छोड़ कर कोई और काम करना चाहिए “ अब कराओके कुमार जी के पास अपने गायकी के हुनर को बचने का एक मात्र रास्ता इश्वर के चरणों में दिखाई दिया ,कराओके कुमार जी ने एक भजन मण्डली को भारी भरकम सहयोग राशी देकर ज्वाइन कर लिया अब कराओके कुमार जी भजन मण्डली के साथ घर घर जाकर अपने गायकी के हुनर को आजमाने लगे जिसका नतीजा ये हुआ की भजन मण्डली वालों को अब भजन गाने का निमंत्रण मिलने बंद हो गए उनकी “ रोज़ी रोटी पर बन आई “ एक कठोर निर्णय लेते हुए भजन मण्डली ने कराओके कुमार जी को ब्याज सहित उनकी दी हुयी सहयोग राशी को लौटाते हुये कराओके कुमार जी को वही सलाह दे डाली जो अब तक सभी कराओके कुमार जी को देते आ रहे थे “ आपको गायकी छोड़ कर कोई और काम करना चाहिए “,पर कराओके कुमार जी कहाँ मानने वाले थे “इश्वर जो करता है अच्छे के लिए करता है” इस विचारधारा के साथ पले बढे कराओके कुमार जी ने गायकी का सफर जारी रखा, मोहल्ले वाले ने कराओके कुमार जी के ऊपर सुबह 06 बजे से लेकर रात साढ़े दस बजे तक गाना गाने के अभ्यास पर पाबन्दी लगा रखी थी और रात साढ़े दस बजे के बाद सुबह 06 बजे तक पूरे देश में शोर शराबा करने पर क़ानूनी पाबन्दी होने की वजह से कराओके कुमार जी को अपनी गायकी के हुनर के लुप्त हो जाने का खतरा सामने दिखने लगा, एक एक करके कई मोहल्ले बदल चुके कराओके कुमार जी ने इस बार आसंमान की ओर रुख किया और ईश्वर से मुखातिब होते हुए बोले “और मेरी कितनी परीक्षा लोगे “? उनकी आवाज़ में दर्द था ,वक्त ने करवट लिया “ ईश्वर के घर देर है अंधेर नहीं “ की कहावत चरितार्थ होने लगी ,लगातार होते तकनिकी बदलाव ने कराओके कुमार जी को कराओके ट्रैक के रूप में वो अवसर प्रदान कर दिया जिसका वो बचपन से इन्तिज़ार कर रहे थे ,अब कराओके कुमार जी को न हारमोनियम वाले की जरुरत थी न किसी तबले वाले की न किसी भजन मण्डली की ज़रूरत थी न किसी आर्केस्ट्रा वालों की जरुरत थी अब कराओके कुमार जी अपने मोबाइल से अपने मन पसंददीदा गानों का ट्रैक खोजते और किसी माईक वाले स्पीकर से कनेक्ट करते और शुरू हो जाते ,शहर के सभी मोहल्ले को छोड़कर खुले मैदान में कराओके कुमार जी रियाज करते लेकिन एक समस्या ये थी की उन्हें सुनने वाला कोई नही था ,कहा भी गया है की यदि श्रोता न हो तो गायक ,कवी ,शायर ,वक्ताओं की मौत हो जाती जाती है, कराओके कुमार जी को “ मम सदृशः बहवः जनाः भविष्यन्ति “ (मेरे सामान बहुत से लोग होंगे ) जैसे ब्रम्ह वाक्य पूर्ण विश्वास था की उनके जैसे गाने वाले और भी लोग दुनिया में होंगे, बस फिर क्या था कराओके कुमार जी ने इन्टरनेट ,सोशल मिडिया you tube पर अपने जैसे गानों वालों का ग्रुप बनाया ,धीरे धीरे उसमे कराओके कुमार जी के सामान गाने वाले बहुत से लोग जुड़ने लगे जिसमे महिलाएं भी शामिल थीं , कराओके कुमार जी का आत्मविश्वास अब सातवें आसमान पर था ,जिस तरह फूल के पीछे भंवरें चले आतें है ठीक उसी तरह महिलायों को देखने वालों की भीड़ भी अब कराओके कुमार जी की टीम का हिस्सा बनने लगी अब कराओके कुमार जी के टीम के सदस्यों की संख्या धनात्मक की जगह गुणात्मक रूप से बढ़ने लगी ,अब वे बाग़ ,बगीचों ,नदी, तालाबों जैसे जगहों पर गायकी का हुनर आज़माने लगे ,एक जैसे बहुत सारे लोग होने की वजह से कोई चाहते हुए इन्हें मना भी नहीं कर पाते ,कराओके कुमार जी से प्रेरित होकर अब शहर में बहुत से कराओके ग्रुप बन गए ,कराओके कुमार जी को सर्वसम्मत्ति से इनका अध्यक्ष नियुक्त किया गया ,अब मुकेश, किशोर, लता, आशा, रफ़ी आदि महान गायकों के जयंती या पुण्यतिथि पर उनके सम्मान में कराओके नाइट्स का आयोजन किया जाने लगा जिसमे कराओके कुमार जी नए प्रतिभाओं का सम्मान करते और उन्हें पुरुष्कार देते ,कराओके कुमार जी का कोहराम अब अपने शबाब पर था बड़े अधिकारी ,नेता ,मिनिस्टर अब उनके कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बनकर आने लगे आखिर भीड़ किसी आकर्षित नहीं करती …….

डॉ बी प्रकाश मूर्ती
जगदलपुर बस्तर (छ.ग. )