मुंशी प्रेमचंद की कहानी ’बूढ़ी काकी’ के बहाने

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ’बूढ़ी काकी’ के बहाने

मंुशी जी की कहानियों में समाज का सच होता। वो भी पूरा का पूरा, बगैर कांट छांट के!
भारत में कहानी के पितामह मुंशी जी हैं। उनके पहले कहानियों का स्वरूप राजा रानी की कहानियों की तरह था। एक तरह से भारत में कहानियों के जन्मदाता मुंशी जी को माना जाता है। उनकी कहानियां कहानी लेखन के लिए एक बेसिक खांचा है। मुंशी जी ने अपने समाज में जो गंदगी देखी और अनुभव किया, उसे लिखा।
इस तरह के वाक्य हम तमाम साहित्यिक लेखों और चर्चाओं में पढ़ते सुनते हैं। इस देश का हर बच्चा अपने दादा दादी और नाना नानी से कहानियां सुनकर अब भले ही न बड़ा होता हो परन्तु हम तो बड़े हुए हैं। महाभारत, रामायण के अलावा अनेक पुराण, पंचतंत्र की कथाएं, हितोपदेश की कहानियां, हमारे देश के वीरों की कहानियां आदि सुनकर ही बचपन बीता और आज भी हम ये सब पढ़ते ही हैं। प्रश्न ये है कि ये जो पढ़ा और सुना है; ये आखिर में है क्या ? इसे आपने तो कहानी माना नहीं, कविता है नहीं, साहित्य है नहीं तो फिर ये है क्या ?
ये नेरेटीव किसने सेट कर दिया कि कहानियां सिर्फ मुंशी जी के बाद ही लिखी गई हैं ? वे कहानियों के जन्मदाता है, ऐसा किसने साबित ही कर दिया ? ठीक ऐसा ही कविताओं के मामले में भी है दोहा, चौपाई, श्लोक आदि कविताएं नहीं हैं बल्कि कविताओं के मसीहा तो अन्य महान लोग हैं।
पुनः प्रश्न सामने है कि ये नेरेटीव किसने सेट किया ? इस प्रश्न से बड़ा प्रश्न है कि ऐसा नेरेटीव क्यों सेट किया गया ?
अगर हमें भगवान राम से बड़ा एक भगवान बनाना है तो हमें एक ऐसा भगवान गढ़ना होगा जो राम के गुणों से श्रेष्ठ हो तब कहीं जाकर वो भगवान मान्य और स्थापित होंगे। या फिर ऐसा भगवान बनाया जाए जो किसी अन्य गुण में श्रेष्ठ हो। उसके लिए पहले हमें उस तथाकथित गुण को पहले महिमामंडित करना होगा। तब उस गुण के स्वामी वो भगवान महिमामंडित होंगे।
चूंकि हम राम की तरह श्रेष्ठ बन नहीं सकते हैं इसलिए राम को महिमामंडित कैसे करें! हम उन गुणों की बारम्बार अनुमोदना करें जो कि हमारे लिए आसान हों और हमारे पास पहले से हो।
ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मुंशी जी की कहानियां भारतीय संस्कारों के विरोध में हैं और वे अवगुणों को महिमामंडित करते थे। क्या उनकी कहानियां भारतीय संस्कृति के अनुसार नहीं चलती हैं ? क्या उनकी कहानी दया, क्षमा, न्याय और परोपकार पर आधारित नहीं हैं ? क्या ये गुण हमारी संस्कृति के मूलगुण नहीं हैं ? तो फिर उनकी कहानियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर से अलग और विशिष्ट कैसे हो गईं ? ये अलग तरह कहानियां कैसे हो गईं ? क्या हमारी दादी नानी हमको न्याय, क्षमा, शील की कहानियां नहीं सुनाती थीं ? क्या वह अपने बच्चों को चोर के प्रति संवेदना, गुण्डे के प्रति दयालुता या फिर देश के लिए प्राण न्यौछावर करने की कहानी के विपरीत विद्रोह की बात सिखाती थीं ?
आपने कभी जरा भी विचार नहीं किया कि कहानी में कला और ढांचे के बहाने आपको किस संस्कार विरोधी दुनिया में लांच कर दिया गया ?
खैर! मुंशी जी ने तो भारतीय कहानी की परम्परा को ही अपना कर लिखा था पर उनके बाद के लोग उनको भगवान बना दिये कला के नाम पर। कहानी के विषय तत्वों को भुलवा कर, कहानी के संदेश को भुलवा कर। हम उनकी कहानी में एक दूसरा दृष्टिकोण खोजते हैं क्षमा, परोपकार, शील के अलावा हमें दिखाया जाता है शोषण, गरीबी और उस वक्त की अनैतिकता! ठीक उसी तरह जिस तरह से पानी के आधे भरे गिलास के संदर्भ में कहा जा सकता है।
भारत की संस्कृति में व्यक्ति के चारित्रिक तत्व की महानता ही हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। उसे कहानी, कविता, महाकाव्य हर जगह दमदार ढंग से उठाया जाता है। वर्तमान कहानियों में इन संदेशात्मक तत्वों, व्यक्ति के नैतिक गुणों को तिलांजली दे दी गई है। और इसके लिए कहानी के कला पक्ष, बुनावट की ही चर्चा होती है। या फिर कहानीकार के संबंध में ही कार्यशाला होती है।
साहित्य के कला पक्ष के भगवान, मुंशी जी को इसलिए कहानी के मंदिर पर विराजमान किया गया। और उनकी कहानियों को आकाशवाणी बताया गया। उस आकाशवाणी में बताया गया कि आपके पास एक चश्मा है जब भी कहानी के संदर्भ में देखो आप ये चश्मा जरूर लगाना। कहानी में कला ढूंढना, ढांचा पकड़ कर उठाना पर नैतिकता की बात भूलकर भी मत करना। आलोचना और समालोचना के संदर्भ विषय नहीं हैं न ही व्यक्तिगत या सामाजिक नैतिकता।
इसके बाद विषय पर बात हो तो सिर्फ दलित शोषण और स्त्री आजादी के अलावा सारे विषय हैं ही नहीं, ऐसा मान लेना।
चूंकि भारत एक देवभूमि है इसलिए यहां पर बगैर मूर्ति पूजा के भी मूर्तिपूजा का विरोध नहीं होता है इसलिए साहित्य का भगवान उन्होंने गढ़ा जो मूर्तिभंजक हैं। हास्य रस पैदा हो रहा है ये लिखते वक्त पर शांत हूं क्योंकि अभी रात के दो बज रहे हैं, कोई मेरी हंसी सुनकर डर न जाये। आप भी ध्यान से पढ़िये और आपका छंटाक भर खून न बढ़े तो कहें। यहां एक महत्वपूर्ण बात और है कि अच्छाई और बुराई, दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का वजूद एक दूसरे से है। पर किसका वजूद भारी रहे वो हमारे लिये विचार करना महत्वपूर्ण है।
खैर! अब बात करते हैं मुंशी जी की कहानी ’बूढ़ी काकी’ की, जिसे मैंने अपने चश्मे से देखा और कुछ अलग सा पाया। शायद आपको भी ये ’अलग’ दृष्टिकोण कुछ अलग सा लगेगा।
बूढ़ी काकी कहानी में एक परिवार में बुजुर्ग की दुर्गति का विस्तृत विवरण है। ऐसा परिवार जो अपने कर्तव्यों को भूल कर सिर्फ धन लिप्सा में जुटा है। कहानी में कुछ दृश्य हैं जिनके माध्यम से हम बुजुर्गों की हालत को समझ सकते हैं। कहानी अपने उद्देश्य में सफल रही है उसने स्थापित कर ही दिया कि भारतीय परिवेश में बुजुर्गों का मालिक भगवान ही है। इसके अलावा और क्या क्या स्थापित हुआ है क्या आपने विचार किया है ?
यहां ये भी समझ आता है कि कहानी यही स्थापित करने के लिए ही लिखी गई थी ?
क्या हम किसी की रचना को पढ़ते वक्त अपनी आंखों से देखते हैं या फिर उधार की आंखों से? क्या हम कहानी के उन बिन्दुओं को अपने मन के पत्थर पर कुरेद-कुरेद कर गाढ़ा नहीं कर लेते हैं जो हमारे मन को बारम्बर बताई दिखाई जाती है। शिक्षा की पद्धति के अनुसार हमारे दिमाग को किसी भी बात को साबित करने के लिए सबूतों की आवश्यकता होती है। और हम उन सबूतों के लिए पुस्तकों में छपी इबारत को ही ढूंढ कर लाते हैं। यानी आज का झूठ कल का सबूत!
मुंशी जी की तमाम कहानियों में हमें क्या देखना है और क्या समझना है, ये सबकुछ तो हमें उनको भगवान बनाने के पहले ही समझा दिया गया था। तो फिर हम क्यों नहीं उनके उन गुणों को देखते हैं जिन्हें छिपाया गया है।
कभी कोई मिले और कहे कि देख भाई वो देख! इंद्रधनुष में लाल रंग कितना गाढ़ा है। तब हम उसके सात रंगों में से मात्र लाल रंग को ही खोज लेते हैं वह भी बिल्कुल उसके दूसरे रंग में मिल जाने के पहले ही। तो फिर हम क्यों नहीं आलोचना और समालोचना के तय बिन्दुओं को अपना चश्मा न बना लें! हम क्यों न देखें उसी चश्में से! भले ही समाजवाद न आये पर समाजवाद की परिकल्पना में क्यों न जुट जायें अपना सुंदर वर्तमान छोड़कर। हम अपनी मौलिकता, प्राकृतिक सोच को त्याग कर एक खांचे में प्रवेश करने को ही तो प्रगतिशीलता का पैमाना बना बैठे हैं। इस वक्त ये भूल जाते हैं कि अगर हम इसी कूपमंडूकता को प्रगतिशीलता मान लेते तो आज इस शब्द की प्रासांगिकता ही खत्म हो जाती। क्या वास्तव में मौलिक सोच का खात्मा ही प्रगतिशीलता है ? जब एक ही चीज को अनेक लोग देख कर अनेक चित्र गढ़ते हैं तब कहीं जाकर कुछ नया उसमें से निकलता है। तो फिर हम कैसे एक ही रंग का चश्मा पहनकर सबकुछ एक ही रंग में रंगा देखें ? भले ही वह रंग लाल हो या हरा या फिर नीला या फिर भगवा! क्या हम अपनी बुद्धि को लाल गलियारे में भटकने दें या फिर दुनिया की तमाम चीजों को अपने ढंग से देखें? क्या सिर्फ मुंशी का प्रतिरूप बनते जाना ही साहित्य का विकास माना जायेगा? अगर यही सही है उनके भक्तों को ऐसा लगता है तो ये कैसे संभव हो गया भई ? उनके पहले जो थे उनको ही भगवान बने रहना था।
प्रगतिशीलता के दो महत्वपूर्ण बिन्दु हैं-पहला यह कि किसी की भी पूजा निषेद्य है। और दूसरा बिन्दु है व्यक्ति को अपने जीवन में प्रगतिशील बने रहना चाहिए। पर क्या ये व्यवहार में है, ऐसा कहीं नजर आता है ? तथाकथित रूढ़िवादी संस्कृति के खिलाफ खड़ा होने को दावा करने वाले क्या खुद कबिलाई युग के रूढ़िवादी नहीं हैं ? लिखो तो सिर्फ किसी स्थापित संस्कृति के खिलाफ, भले ही उसमें अच्छाई हो। देखो तो सिर्फ गरीब का शोषण, अमीर की अच्छाई भी मत देखो! बात करो तो सिर्फ अधिकारों की, कर्तव्यों की ओर आंखें मूंद लो। ये तो काले जल की परिभाषा हो गई। बदबू आज नहीं तो कल आनी ही है।
किसी की पूजा का विरोध करना चाहिए और उसके सिद्धांतो की ही बात होनी चाहिए। पर आपने तो कुछ देव गढ़ दिये हैं साहित्य के देव, जिनके बरअख्स ही सबकुछ पढ़ा लिखा देखा जाता है। आलोचना के अलावा सबकुछ बेकार है, आलोचक ही सबकुछ है।
खैर! अपनी बातें कहां से कहां पहुंच गईं। मुंशी जी के साहित्य को हमने किस दृष्टि से देखा है किस रंग के चश्में से देखा है इस पर विचार कर रहे थे हम। हमने कितनी आसानी से ये स्थापित कर दिया कि भारतीय परिवारों में बुजुर्गों की दुर्दशा होती है। उनकी हालत चिन्ताजनक है। चूंकि हमारे भगवान ने कहा है इसलिए ये सही है। क्योंकि इनकी कहानियों के पैमाने पर सबकुछ मापा जायेगा इसलिए हर लेखक ने इसी ओर ध्यान दिया और कागज रंग डाले। चूंकि हर ओर इस तरह की अफवाहों के संदेश साहित्य देने लगे तो फिर समाज में ये स्थापित हो ही गया।
आइये हम मुंशी जी की कहानी ’बूढ़ी काकी’ के कुछ दृश्य उठाकर आपके सामने रखते हैं। जिनमें से शायद कुछ नया मिल जाये। आखिर प्रगतिशील सोच रखकर अपना आंकलन भी तो करना ही चाहिए। अपनी सोच को टटोलना भी चाहिए, अपने स्थान को जानने की कोशिश करनी चाहिए।

बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है।
अब एक भतीजे के अलावा और कोई न था। उसी भतीजे के नाम उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति लिख दी।
लड़कों को बुड्ढों से स्वाभाविक विद्वेष होता ही है
सम्पूर्ण परिवार में यदि काकी से किसी को अनुराग था तो वह बुद्धिराम की छोटी लड़की लाडली थी।
दो-एक अंग्रेजी पढ़े हुए नवयुवक इन व्यवहारों से उदासीन थे। वे इस गँवार मंडली में बोलना अथवा सम्मिलित होना अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल समझते थे।
घी और मसाले की क्षुधावर्धक सुगंधि चारों ओर फैली हुई थी।
भगवान को भोग नहीं लगाए तब तक धैर्य न हो सका।
मेहमानों के नाई और सेवकगण भी उसी मंडली के साथ किंतु कुछ हटकर भोजन करने बैठे थे
दो-एक मेहमान जो कुछ पढ़े-लिखे थे सेवकों के दीर्घाहार पर झुंझला रहे थे।
जब तक मेहमान लोग भोजन न कर चुकेंगे घर वाले कैसे खाएंगे।
जिस प्रकार निर्दयी महाजन अपने किसी बेइमान और भगोड़े कर्जदार को देखते ही उसका टेंटुआ पकड़ लेता है।
इस अधर्म का दंड मुझे मत दो नहीं तो मेरा सत्यानाश हो जाएगा।
रूपा को अपनी स्वार्थपरता और अन्याय इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप में कभी न दिख पड़े थे।
उपर्युक्त पंक्तियां मुंशी जी रचित कहानी ’बूढ़ी काकी’ से उद्धृत हैं। ये पंक्तियां भी कहानी को मजबूती प्रदान कर रही हैं। इनके अर्थों के भीतर जाने के पहले एक महत्वपूर्ण बात और कहनी है कि बूढ़ी काकी कहानी को पढ़कर ऐसा क्यों लगता है कि वो हमारी संस्कृति के विद्रूप रूप को सिर्फ दिखाती नहीं बल्कि स्थापित करती है। हमें ऐसा क्यों लगता है कि बुजुर्गों की दयनीय स्थिति से परेशान समाज क्या करे। अपने बुजुर्गों को कब समाज इज्जत देना सिखेगा?
हमें ऐसा क्यों नहीं लगता कि ये कहानी तो किसी एक परिवार की आपबीती, कहानी रूप में आई है ? ऐसा क्यों लगता है कि ये तो हर घर में ही होता है ?
हमें ऐसा क्यों नहीं लगता कि ये कहानी हमें बताती है कि पश्चताप ही हमें हमारे अपराधों की गहराई से अवगत कराता है और फिर हमें नैतिकता अपना कर जीने, मर्यादापूर्वक जीने को प्रेरित करता है।
क्या इस कहानी से यह नहीं लगता कि एक भारतीय मूल्यों को स्थापित करने का भरसक प्रयास किया जा रहा है ?
बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है।, कहानी की प्रथम पंक्ति ही साबित करती है कि समाज के उन लोगों को ध्यान देने की जरूरत है जो अपने बूढ़े मां बाप को बोझ समझते हैं। और अपने कर्तव्य से विमुख होकर उनके साथ निर्दयी बन कर व्यवहार करते हैं।
उसके बाद कहानी में लिखा है-अब एक भतीजे के अलावा और कोई न था। उसी भतीजे के नाम उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति लिख दी।
यानी संयुक्त परिवार में अपनापन विद्यमान होता है जिसके भरोसे हम अपना जीवन भी झोंक सकते हैं। ऐसा संयुक्त परिवार गया कहां ? क्या ये समय की आवश्यकता होने के साथ ही साथ मनुष्य के लंबे जीवन में आने वाली अनियमित, अनियंत्रित परेशानी, घटना के लिए आवश्यक नहीं हैं ? क्या इसका खत्म हो जाना चिंतनीय नहीं है ?
लड़कों को बुड्ढों से स्वाभाविक विद्वेष होता ही है, क्या ये पंक्ति पीढ़ियों के गेप को नहीं बताती है ? वह गेप जो हमारी संस्कृति में जाने कैसे स्थान बना गई है।
सम्पूर्ण परिवार में यदि काकी से किसी को अनुराग था तो वह बुद्धिराम की छोटी लड़की लाडली थी।
यह एक महत्वपूर्ण बात है जो भारतीय परिवार जीवन प्रणाली की सार्थकता बताती है और वह है संयुक्त परिवार! इस परिवार में कोई भी महत्वहीन नहीं होता है, यथायोग्य सभी अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। बूढ़ों को बच्चों का साथ और बच्चों को बूढ़ों का साथ! जब बुढ़ापा बचपन का पुनरागमन होता है तो दो बच्चों को साथ खेलने का साधन हो जाता है। संयुक्त परिवार प्रणाली को किस प्रकार तोड़ा गया है, इस पर चिंतन जरूरी है।
दो-एक अंग्रेजी पढ़े हुए नवयुवक इन व्यवहारों से उदासीन थे। वे इस गँवार मंडली में बोलना अथवा सम्मिलित होना अपनी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल समझते थे।
इन पंक्तियों में जो कुछ लिखा गया है वह तो पूरी कहानी का मनोविज्ञान समझा देता है। संपूर्ण कथा को स्पष्ट कर देता है। यही वह कारण है जिसने भारतीय संस्कृति को भारतीय जीवन पद्धति को जड़ों से हिला दिया है। यही भाव इस पंक्ति में भी है-
दो-एक मेहमान जो कुछ पढ़े-लिखे थे सेवकों के दीर्घाहार पर झुंझला रहे थे।
क्या कहानी में समयानुकूल प्रश्न नहीं उठाये गये थे ? आश्चर्य ये है कि ये प्रश्न हमें क्यों नहीं दिखाई दिये ? ये हमारी आंख का मामला नहीं है बल्कि मांइडसेट का मामला है।
घी और मसाले की क्षुधावर्धक सुगंधि चारों ओर फैली हुई थी।
इस कथन में क्या मुंशी जी ने यह नहीं बताया है कि जो भोजन बन रहा था वह क्षुधावर्धक था यानी जो कोई उसकी खुशबू को ग्रहण करे वहीं उसका दीवाना हो जाये ? जब ऐसा था तो बूढ़ी काकी का उस भोजन के लिए लालायित होना कौन सा गुनाह था ? परन्तु मेहमानों के खाने के बाद ही खाने की परम्परा थी इसलिए उस बूढ़ी काकी को भोजन नहीं दिया गया था।
इस विश्लेषण से नहीं लगता कि कहानी बुढ़ापे के दिशाहीन हो जाने का वर्णन मात्र है ? और हमने क्या किया ? हमने ये सिद्ध कर दिया कि बुढ़ापे का अपमान हमारी परम्परा थी। हम ऐसा क्यों सोचे, ये भी बहुत बड़ा प्रश्न है।
मेहमानों के नाई और सेवकगण भी उसी मंडली के साथ किंतु कुछ हटकर भोजन करने बैठे थे
ये संदर्भ क्या समझा रहा है ? यही न कि हमारी परम्पराओं में सभी वहीं भोजन करते थे और वही भोजन करते थे। क्या हमने इस कहानी से ये बिन्दु देखने की जुर्रत की ?
क्यों नहीं दिखा ये बिन्दु ? जब हमें ’ठाकुर का कुंआ’ में बहुत कुछ दिखा था, ’ईदगाह’ में हामिद का जो प्रेम दिखा वो लाडली में क्यों नहीं दिखता है?
जिस प्रकार निर्दयी महाजन अपने किसी बेइमान और भगोड़े कर्जदार को देखते ही उसका टेंटुआ पकड़ लेता है।
ये पंक्ति क्या कुछ अद्भुत नहीं महसूस होती है आपको पढ़ते वक्त ? ’बेइमान और भगोड़े कर्जदार’ को पकड़ने दौड़ता है निर्दयी महाजन।- अब शायद कुछ अच्छे से समझ आया हो।
इस अधर्म का दंड मुझे मत दो नहीं तो मेरा सत्यानाश हो जाएगा।
रूपा को अपनी स्वार्थपरता और अन्याय इस प्रकार प्रत्यक्ष रूप में कभी न दिख पड़े थे।
ये दो वाक्य पूरी कहानी के प्राण हैं। पूरी कहानी के संदर्भ हैं जिनके इर्द-गिर्द सबकुछ रचा गया है। भारतीय संस्कृति के मूल्यों की स्थापना के लिए इतने सारे शब्दों को लेकर दृश्य गठन किया गया है। रूपा के माध्यम से हमने जाना कि कैसे समय समय पर भारतीय मूल्य, व्यक्ति के जीवन को सार्थक दिशा देते हैं। किस तरह आदमी अपने परिवार के प्रति बगैर कानून के डंडे के भी समर्पित होता है। उसके अनुभव उसके लिए जीवन के ग्रंथ बनते हैं। न कि शास्त्रोक्त वाक्य!
आदमी अपने जीवन में शास्त्रोक्त वाक्यों को अनुभवों में तौलता है और फिर अपनी बुद्धि के प्रयोग से आगे की सोच बनाता है।
हमने पूरी कहानी पढ़ी, सारे दृश्य आत्मसात किये और मुंशी जी की जय का नारा भी लगाया। पर क्या हम मुंशी जी की आत्मा तक पहुंच पाये, इस पर कौन विचार करेगा ? मेरा प्रश्न पुनः सामने आ खड़ा हुआ है कि हमने क्यों नहीं देखा इन बिन्दुओं को या फिर कैसे नहीं देख पाये ?
इसका एकमात्र कारण है हमारी ब्रेनवाश की गई कुंठित सोच! हमें बताया गया है कि इस ढंग से सोचना है इस ढंग से समझना है। अगर हमारे अनुभव अलग भी हों तो हमें वही मानना है जो हमें साहित्य की प्रगतिशीलता ने बताया है। इसके लिए चाहे तो हम अपनी अच्छाइयों को ही तिलांजलि देनी पड़े। हमारे दिमाग में प्रगतिशीलता का अर्थ मात्र भारतीय संस्कृति का आंख मूंद कर विरोध करना ही ठूंसा गया है। ठीक इसके साथ विदेशी सोच को आंख मूंदकर मान लेना ही प्रगतिशीलता है, यह भी हिला डुलाकर दिमाग में भरा गया है।
अब यहां एक प्रश्न और रखना चाहूंगा कि मुंशी जी की तमाम कहानियों को किस चश्में से देखना है हमें ? क्या उन्होंने वही लिखा है जो हमने आज तक समझा है ? क्या वे भारतीय संस्कृति में सिर्फ गंदगी ढूंढकर ही स्थापित करते रहे ? या यूं मान लें कि वे सिर्फ गंदगी ही देख पाते थे ? या हम अपनी आंखों में इस तरह का चश्मा डालकर बैठे हैं जिससे उनके लेखन को इसी तरह से देखने की मजबूरी मान बैठे हैं।
साहित्य का भगवान, कहानी का देवता और काव्यदेव गठन की प्रक्रिया क्या थी ? क्या उसी प्रक्रिया के तहत ही हमारे प्रगतिगामी आधुनिक महापंडितों ने राज्याभिषेक कर मुंशी जी को भगवान के आसन पर बैठाया था ? जबकि वे खासकर मूर्तिपूजा के भयंकर विरोधी हैं। चूंकि जिन गुणों की वंदना करनी है तो उसका देवता होना जरूरी है। और फिर भारत एक देवभूमि है इसलिए यहां की मानसिकता के अनुसार किसी लेखक का भी तो देव होना चाहिए कि नहीं ? भले ही मां सरस्वती है ज्ञान की देवी, परन्तु वो सर्वधर्ममान्य नहीं हो सकती हैं क्योंकि ये देश विभिन्न धर्मप्रधान है। इसलिए एक सर्वधर्ममान्य देव बनाकर जबरन मुंशी जी को बैठा दिया गया। और उनके लेखन को फतवे के माघ्यम से आकाशवाणी बनाकर अपरिवर्तनीय घोषित किया गया। ठीक उन ग्रंथों की तरह जो देववाणी हैं अपरिवर्तनीय। इसके बाद इस देवता के गुणों को मानने के लिए ’लेखक जात’ को बाध्य किया बिल्कुल कबीलाइयों की तरह।