काव्य – दिनेश विश्वकर्मा

औसत जिंदगीनामा

कितनी परतें हैं जिंदगी की समझूं अगर…
तकिये पर ख्वाबों की कसीदाकारी है
सड़कों पर तारीखें बिछी हैं
रिक्शों के पीछे उधारी वाली पर्ची छपी है,
मैं मौजूद हूं के हर पल ख़्यालातों के गिरफ़्त में हूं
अजब कश्मकश है
एक जिंदगी
एक ही वक़्त पे
सौ किरदारों का हुनर कैसे थोप जाती है…..

बरसों पहले जब किराये के आशियानों में
ये शहर कभी अजनबी लगता
तो गांव के अपनेपन से
बिछड़ने की कसक होती…..

तमाम जमापूंजी की सूरत में
कुछ आंगन समेटे
ये तीन कमरे का पक्का मकान
’राशन कार्ड’ की फेहरिस्त में शुमार नहीं होता
वो कैरोसीन की महक मुझसे खफा है
जाने कबसे…..

अखबार बयां कर रही है
एक नगर बंद की ताजा तस्वीरें
कई ट्रेक्टर सब्जियां सड़कों पर बिखरी पड़ी हैं

किसानों को मुकम्मल कीमत न मिल पाने के एवज में
और मेरे शहर में, मैले चिथड़े कबाओं में गुम एक शख्स
बाजार खत्म होने के बाद सड़ी सब्जियों को समेटकर
अपने हिस्से की जिंदगी से वफा निभाता है
उसके इस ठहराव को
सारा शहर बड़ी मसरूफियत से तकता है…..

हर सोचने वाला यह सोचकर
कि उसकी तरह कोई सोच रहा होगा
सोचते – सोचते उम्र कई मीलों का
सफर करती है,
कभी -कभी तो घर की दीवारें
सरक -सरक कर मेरे करीब आती हैं
सुबक -सुबक कर कह देना चाहती हों जैसे
ईट-गारे अब थक चुके हैं
लोहे की हड्डियों को जंग लग चुकी है
दराज के कई कागजों में
अस्पताल की पुरानी पर्ची झाँकती रहती है
मेरे तमाम परहेजों पे अपना हक जताती हुई…

मुकद्दर, मेहनत जोड़कर हम सब
अपने अक्स में ढलते है
कुछ बढ़ गये हमसे हजार क़दम
कुछ चन्द सिक्कों से पीछे हैं
जब देखा किसी बेबस को
मन मुकम्मल मददगार, हालात मगर कतरा के मिले

इस कदर ताउम्र पीछा करती हैं
इसके, उसके अपने हालात……

और मैं सब कुछ ठीक हो जाने की
खुशरंग नज़ीरों की तर्जुमा करके
पलकों को किवाड़ बंद कर लेने को
कहता हूँ
सूरज भी अपनी शनासाई के सफे पलट गया
कल निकल पड़ेगा दूसरी सिम्त से;
परिन्दों के सस्वर गान में
उम्मीदों, उमंगों की पहली किरण में
कहीं अजानों की बोल में
कहीं ढोल मंजीरों की थाप के साथ…..

दिनेश विश्वकर्मा
कोण्डागांव
मो.-8463852536