लघुकथा-पूर्णिमा विश्वकर्मा

दुःखवा मैं कासे कहूं


’’अरे कमली! तू अभी काम करने आ रही है ? आज इतनी देर क्यों कर दी ? तेरे कारण आज मुझे फिर स्कूल से छुट्टी लेनी पड़ी। लकी तेरे सिवाय और किसी के पास रहता ही नहीं है। उसे अकेला छोड़कर मैं कैसे पढ़ाने स्कूल जाती, अगर जाती भी तो मेरा सारा ध्यान घर में ही लगा रहता।’’
‘‘मेम साब! क्या करें, अपनी तो किस्मत ही फूटी है।’’
‘‘अरे! क्या हुआ कमली ? रो क्यों रही हो ?’’
‘‘देखो न मेमसाब! आज फिर मेरे मर्द ने मारा है। पीठ और हाथ-पैर में निशान पड़ गये हैं, अभी तक दर्द हो रहा है।’’
‘‘आखिर बात क्या हो गई थी कमली ?’’
’’मेमसाब! आज सुबह की बात है। सोकर उठी तो उसी समय वो पीने के लिए पैसे मांगने लगा…रात की अभी पूरी उतरी भी नहीं थी कि फिर से पीने को चाहिए।’’
’’…..’’
‘‘मैंने भी कह दिया-तेरे पीने के लिए मेरे पास पैसे नहीं हैं। इसी बात पर झगड़ा बढ़ गया। मुझसे मारपीट की हमेशा की तरह गाली गलौच करते हुये, वो रूपये छीनकर ले गया। मैंने बहुत समझाया कि ये रूपये मैंने मुन्नी की स्कूल की फीस के लिए बड़ी मुश्किल से बचा कर रखे थे। तो कहने लगा-मुन्नी को पढ़ाकर क्या साहब बनायेगी। उसे घर का काम सिखा, अपने साथ ले जाया कर, आखिर उसको भी तेरी तरह एक दिन चूल्हा फूंकना है। पढ़ाई लिखाई करने से कोई फायदा नहीं। और रूपये लेकर वो चला गया। कभी-कभी तो सोचती हूं मेमसाब, कहीं जाकर जान दे दूं। इस नरक से पीछा तो छूटे, रोज रोज की इस मारपीट से तंग आ गई हूं। कब तक आखिर हड्डी तुड़वाती रहूंगी। मर जाऊं तो अच्छा रहेगा। परन्तु मुन्नी का मुंह देखती हूं तो सोचती हूं कि उसका क्या होगा। मैं मर गई तो ये दूसरी औरत ले आयेगा और मजे करेगा।’’
‘‘अरी कमली! रोज-रोज इतनी मार खाती है तू, तो उसको छोड़ क्यों नहीं देती ?’’
‘‘मेमसाब! उसे छोड़कर आखिर जाऊं भी तो कहां, मायके में कोई नहीं है जो सहारा दे और जब दारू उतर जाती है तो मुझे प्यार भी तो करता है। आखिर मरद है मेरा, उसके साथ रहकर मैं सुरक्षित हूं। लोगों का डर तो नहीं रहता। नहीं तो आज के समय में जवान अकेली औरत को सभी भूखे भेड़िये की नजर से देखते हैं, मौका मिला नहीं कि झपट पड़ते हैं। और हम जैसी अनपढ़ औरतों का मरद के घर के सिवाय ठिकाना ही कहां है। जीना मरना सब उसी के साथ है। हां, मेमसाब आप तो पढ़ी लिखी हैं, नौकरी करती हैं, अगर ऐसा मौका आया तो कुछ भी कर सकती हैं। इसलिए तो सोचती हूं, मुन्नी को खूब पढ़ाऊंगी, जैसी मेरी जिन्दगी है, मुझ जैसी उसकी हालत न हो।’’
’’…….’’
‘‘अरे मेमसाब! आपके माथे पर क्या हो गया है? ये चोट कैसी…?’’
‘‘कुछ नहीं कमली, रात में बाथरूम में पैर फिसल गया था, थोड़ी चोट आ गई।’’ कहकर मैं बरामदे में आ गई।
कमली ने अपने मन का हाल तो रोकर सुना दिया किन्तु मैं कितनी विवश हूं। अपने मन का हाल किसी से कह भी नहीं सकती। लोगों की नजर में हम हाई सोसायटी के जो हैं। क्योंकि मैं एक अधिकारी की पत्नी हूं। मुझमें सोचने की क्षमता है, माथे की चोट से ज्यादा मन में चोट लगी है।
कल रात फिर पार्टी से ज्यादा पीकर आने के कारण ही तो मेरा आकाश से झगड़ा हुआ। और आकाश ने मुझे इतनी जोर से तमाचा मारा था कि संभलते-संभलते भी सर दीवार से टकरा गया, इसके बावजूद भी क्या मैं आकाश को छोड़कर जा सकती हूं ? नहीं ? जाऊंगी भी तो कहां ? क्योंकि मां पिताजी मुझे बड़ी सम्पन्न और खुशहाल समझते हैं। मेरी सच्चाई जानकर उन्हें दुख होगा और मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण छोटी बहन की शादी में अड़चन आये। क्योंकि घर में बैठी विवाहित लड़की वैसे भी बोझ सी होती है।
मां-पिताजी है तब तक तो ठीक है, भैया-भाभी कब तक साथ देंगे। अगर अकेली कहीं रहूं तो कमली की बात सही है कि अकेली औरत को समाज चैन व इज्जत से जीने नहीं देगा। किस-किस को अपनी बेगुनाही का सबूत देती रहूंगी। जीना दुश्वार हो जायेगा।
आखिर क्या फर्क है कमली और मुझमें ? वो अनपढ़ गंवार है, मैं शिक्षित हूं। वो अपना दुःख बताकर मन हल्का कर लेती है मैं वो भी नहीं कर सकती क्योंकि मैं एक शिक्षित उच्च सोसायटी की सभ्य महिला हूं, जमाने की नजर में।
औरत जो सदियों से सह रही है और कह नहीं रही है, मन में बोझ लिए। यही मेरी नियती है। ‘‘आखिर दुःखवा मैं कासे कहूं ?’’


पूर्णिमा विश्वकर्मा
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