स्पष्टीकरण

स्पष्टीकरण
1-‘गुड़दुम’ पत्रिका का प्रकाशन किसी तरह के आर्थिक लाभ के लिए नहीं किया जा रहा है बल्कि स्थानीय बोली के लोगों के बीच रचनाधर्मिता बढ़ाने, विकसित करने के लिए उनकी रचनाओं का प्रकाशन किया जायेगा।
2-जिस तरह कोस-कोस में पानी का स्वाद बदल जाता है उसी प्रकार बोलचाल में भी पांच कोस में बदलाव होता है; यह एक कहावत का भावार्थ है। ठीक यही स्थानीय बोलियों के साथ भी हो रहा है। हल्बी, भतरी में उड़िया, तेलगु और मराठी भाषा का प्रभाव तो है ही, आपस में भी घालमेल है।
3-छत्तीसगढ़ी बोली का भी काफी प्र्रभाव है।
4-साथ ही साथ स्थानीयता, परम्परागत बोलचाल और आधुनिकता का भी प्रभाव देखा जा सकता है।
5-हल्बी को अब तक मानक स्वरूप प्रदान नहीं किया गया है।
6-पत्रिका के लिए रचनाकारों से प्राप्त रचनाओं का अध्ययन बताता है कि हर क्षेत्र की बोली में अंतर है।
7-रचनाकारों की रचनाओं को किंचित सुधार कर जस का तस प्रकाशित करना ही उचित जान पड़ता है क्योंकि मानक तय नहीं किये गये हैं तो हर किसी का दावा है कि उन्होंने जो लिखा है वही मानक है।
8-परम्परागत गीत कथाओं में किये गये वार्तालाप मानक रूप के इर्द-गिर्द हैं पर एकरूपता का अभाव है।
9-‘गुड़दुम’ का प्रयास होगा कि एक (मानक) रूप के आसपास रचनाओं में बोली का प्रयोग हो।
10-रचनाकारों के द्वारा प्रदत्त रचनाओं को प्रकाशित किया जा रहा है। पत्रिका का उद्देश्य रचनाओं और विचारों का आपसी प्रसारण मात्र है न कि भाषा, व्याकरण आदि सिखाना, पढ़ाना और शोध करना।
11-भाषायी भिन्नता से असहमति के लिए मूल लेखक से सम्पर्क कर उन्हें भाषा संबंधी नियमावली से अवगत करायें तो आपका सहयोग प्रशंसनीय होगा।
12-अपने-अपने क्षेत्र के रचनाकारों को लेखन के लिए प्रेरित कर उनकी रचनाएं प्रकाशन हेतु भिजवाने का कष्ट करें। साथ ही साथ उन्हें भाषायी ज्ञान भी देवें तो स्थानीय बोलियों के मूलभूत विकास के लिए आपका योगदान होगा। साथ ही साथ भविष्य के लिए नये रचनाकार तैयार होंगे।