शराबबंदी पर शराबियों का चिंतन
वे रोजाना पीते थे। बगैर पिए उनका हाथ-पॉंव कांपता था। भोजन अपचा रह जाता था। नींद नहीं आती थी। दिल, दिमाग और जुबान का तालमेल बिगड़ जाता था।
यहॉं तक कि मद्यरूपी जीवनामृत नहीं मिलने पर उन्हें बेहोशी के दौरे पड़ते थे। इस बीच ‘दो बूंद जिंदगी की’ मिल जाता था, तो भले-चंगे हो जाते थे।
कहीं जाते थे, तो वे अपने साथ प्राणप्रिय दारू की ‘बोतल’ साथ ले जाना नहीं भूलते थे। जब खत्म हो जाता थी, तब लोकल ब्रांड ढूं़ढ़ते थे या दारू अड्डे भागे चले जाते थे।
उन्हें उनके परिजन समझाकर हार चुके थे या कहो कि शराब पी-पीकर उन्होंने परिजनों को हरा दिया था।
समझाने पर वे सुबह कसम खाते थे, शाम को तोड़ते थे। इसके लिए उनके पास ढेरों बहाने रेडीमेड में ऐसे मौजूद रहते थे, जैसे हारे हुए नेता के पास रहते हैं। दारूखोरी की बहानेबाजी में उनका कोई सानी नहीं था। यदि बहानेबाजी की प्रतियोगिता या ओलंपिक होता, तो उन्हीं की तूती बोलती, इतना तय था।
वे दो थे। उनमें गाढ़ी छनती थी। बिल्कुल दांत काटी रोटी की मानिंद।वे साथ-साथ पढे़ थे और आठवीं बोर्ड में फेल हो जाने से स्कूल छोड़कर कभी
गॉंव में, तो कभी शहर में कुली-मजूरी कर अपना व अपने लोगों का पेट पाल रहे थे।
उनमें से एक, जिसका नाम कल्लू था, दिल की गहराई से बीड़ी के बुझे हुए ठूॅंठ को ‘‘फूंक-फूंक’’ कर पीते हुए लगी-लाग में अफसोस जताया, ‘‘अमा यार, जब शराबबंदी पूरी तरह हो जाएगी, तब कहांॅं से जुगाडेंगे शराब? शराबबंद होने से उनका जीना, मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन वैसे ही हो जाएगा, जैसे डॉन को पकड़ना, मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। कल ही दो घंटे के लिए दारू नहीं मिला, तो कॅंपकॅंपी छूट रही थी; दिमाग फ्यूज हो गया था। बत्ती गुल हो गई थी।’’
कल्लू से इत्तफाक रखते हुए लंगोटिया यार बल्लू बोला, ‘‘सचमुच मरण हो जाएगा, यार। हम जल बिन मछली की तरह तड़प उठेंगे। सरकार! कुछ तो रहम करो ? हे भगवान! सरकार को सदबुद्धि दे?’’
वह हाथ ऊपर उठाकर भगवान की स्तुति किया, ‘‘हम जैसे लोगों को पीने-पिलाने का लायसेंस दे सरकार। ऐसे में तो हमको टपकते देर नहीं लगेगी। वह चाहे तो पीनेवालों का सर्वे करा ले कि कौन-कौन हैं आदी। फिर उन्हें उम्र और डोज के मुताबिक पीने की छूट दे।’’
‘‘और नही ंतो क्या?’’इस पर कल्लू सहमति जताते हुए बोला,‘‘मैं जो सोच रहा हूॅं क्या तू भी वही सोच रहा है बल्लू?’’
‘‘तू क्या सोच रहा है। पहले यह तो पता चले, फिर अपनी बताउंगा।’’ बल्लू प्रत्युत्तर दिया, तो उसके उत्तर से संतुष्ट होते हुए कल्लू ने तरकीब सुझायी,‘‘मैं सोच रहा हूॅं कि शराबबंदी की घोषणा के पूर्व घर की चीजें गिरवी रखकर एकाध पेटी अंग्रेजी ले आते हैं। चार-छह माह तो निश्ंिचतता से ‘‘टुन्न’’ रहने को मिलेगा।’’
‘‘तू बड़ा भोला है रे कल्लू।’’ बल्लू एक बड़ा पेग उड़ाते हुए दलील पेश किया,‘‘ये अंग्रेजी विजय माल्या जैसे उन बेईमानों के लिए है, जो दोनों हाथों से बेईमानी कर या तो घर भर रहे हैं या विदेश भाग रहे हैं। ऐसे लोगों के पास कपटचारी व मक्कारी का पैसा भरा है, इसलिए महंगा पीते हैं। हम मजदूर विदेशी क्या देशी भी मुश्किल से जुगाड़ पाते हैं रे?’’
जिस बिचौलिए के पिछवाडे़ में ये दोनों अक्खड़ पियक्कड़ गम गलत कर रहे थे; उसकी मालकिन उनकी बातें ध्यान से सुन रही थी। उससे रहा नहीे गया। वह उनकी परेशानी को दूर करने के मकसद से स्थानीय हल्बी बोली में बोली,‘‘ठौंका गोठयाय सहास तुमन दादामन। आमचो रहत ले तुमन काईं गोठ काजे फिकर नी करा नू। आमन आसू तुमचो काजे। सरकार लाख कोशिश कर ले, आमन आपलो धंघापानी के बुढ़ाउन पिला-झीला के मारूॅंदे काय।’’
‘‘अच्छा…छा…छा!’’ वे दोनों सहसा सिर उठाकर उस बिचौलिया औरत को देखने लगे, जो आशा की किरण बनकर उभरी थी। वे चकित थे कि वह औरत होकर भी हिम्मत दिखा रही है। कल्लू हैरत से हल्बी बोली में पूछा,‘‘तुमन कोन बाट ले जुगाड़ करासे दीदी? सब बाट तो नाकाबंदी रहेदे।’’
‘‘हुनचो उबाट आमचो लगे आसे जानू। ‘मंद’ के बंद करतो नियम शहर-गांव ने रहेदे। मांतर रान बाटे नी रहें। रान चो ‘‘फूली’’ मंद आमचो लग अमरेदे। आमी उनके ‘‘राशि’’ बनाउन तुमनके चखाउॅंदे।’’ बिचौलिया औरत बेतकल्लुफी से हल्बी बोली में जवाब दी, तो दोनों शराबी हैरत से मुंह फाड़कर एक-दूजे का मुंॅंह देखने लगे, गोया उनको विकल्प मिल गया हो। यह औरत उनके लिए फरिश्ता बनकर आ गई हो।
उन्हें लगा कि उनका चिंतन सार्थक हो गया है। अब चिंता की कोई बात नहीं। वे उठकर बांहों में बांहे डालकर झूमने-गाने लगे और हल्बी बोली में गाने लगे कि ’’ऐदांय फिकर नॉट। फिकर नॉट। हामी जाउॅंसे, आपलो बाट। आपलो बाट।’’

वीरेन्द्र देवांगन
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