काव्य संग्रह ’काव्य यात्रा’ की समीक्षा-सनत कुमार जैन

सुरेन्द्र जी की कविता में…..

कविता लिखते वक्त कवि क्या सोचता है और पढ़ते वक्त पाठक उसे पढ़कर क्या समझता है ये दोनों विषय जुदा से महसूस होते हैं। काव्य के गुरूघंटालों ने इनके नियम अपने -अपने अनुसार गढ़े हैं। परन्तु कवि की भावनाओं को पाठक ठीक से समझ ले यही सही काव्य होता है। ये बात अलग है कि सौन्दर्य में वृद्धि के लिए कवि तरह तरह के प्रयोग करता है।
सुरेन्द्र जी की कविताएं अपने लेखकीय मन को पाठक तक पहुंचाने में सफल हैं। पाठक, सुरेन्द्र जी की कविताएं पढ़कर आनंदित होता है क्योंकि उनमें उसके अपने हृदय की पीड़ा और उसके मन का संघर्ष है। अपनेपन से भरी नहीं बल्कि अपने मन से भरी सुरेन्द्र जी की कविताएं पाठक को यूं ही आकर्षित नहीं करती हैं। आप उनकी ’परकीया’ कविता ही देखिए।
कलम के मालिक के अंतर्दंद्व को किस बखूबी चित्रित करती है। उसके मन में ना-ना प्रकार के विचार आते हैं और वह अपने नैतिक संस्कारित मन के सहारे लगातार लड़ता रहता है उन प्रश्नों के जवाब देता जाता है। व्यंग्य का पुट लिए लिखी ये कविता कहती है कि-
कि सदियों की ईमानदारी का खुमार लिए
बेईमान हो जाना, कितना रोमांचकारी होता है।
फिर यही कविता कहती है कि
निब भले ही घिस गया है
पर ’सॉफ्ट’ चलता है।
अपनी बात में व्यंग्य पैदा करने के लिए क्या बिम्ब बनाया है देखिए। ऐसे अंदाज ही पाठक तक अपनी बात आसानी से पहुंचाने में सहायक होते हैं।
किसी आलीशान बंगले के बाहर-
तैनात अलसेशियन से बातें करता हुआ।
अपनी एक और कविता ’मेहनतकश का रन्दा’ कविता में उन्होंने रंदे के चलने से होने वाली आवाज को प्रयोग में लाया है- खर्रस खर-खर, खर्रस खर-खर!
अपनी कविता में शब्दों से ध्वनि पैदा करने का ये हुनर बहुत कम कवि प्र्रयोग में लातेे हैं। रंदे की आवाज के साथ पाठक और ज्यादा अपनत्व के साथ कविता के मर्म से जुड़ जाता है। वैसे भी छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी बोली में जो बातचीत होती है उसमें ध्वनि को बात-बात में प्रयुक्त किया जाता है। उदाहरण स्वरूप देखिए- भुने चने खाते वक्त अगर एक ठुर्रू चना आपके दांत में आ जाये तो वो जिस तरह से दांत के सहारे टूटता है उसकी आवाज को कहते हैं ’कड़कड़देनी’!
रंदे की आवाज से अपनी कविता को पढ़ने के लिए पाठक को आकर्षित करना और फिर अपनी बात रखना ये भी एक कला है जिसमें सिद्धहस्त होना एक कवि के लिए आवश्यक है।
इस कविता में सुरेन्द्र जी बता रहे हैं कि मेहनतकश यानी मजदूर के सामने बहुत कुछ हो रहा है वह सब कुछ देख भी रहा है। शराब का बेटा, बीड़ी की बेटी, मेहनत के दानों ने शक्ल बना ली है सिक्कों की, आदि प्रतीक बिम्ब अद्भुत हैं जो एक वर्गविशेष को जता रहे हैं।
मेहनतकश वर्ग के सभी लोगों का आह्वान करते हुए कवि कहते हैं कि सबकुछ असमानता हट जायेगी अगर तुम सब एकसाथ विरोध करोगे, एक हो जाओगे तो। वर्गभेद, शोषण खत्म हो जायेगा। अपने विरोध को एक साथ करना है उसे धार देकर तैयार रखना है। परिस्थितियां बदलेगीं जरूर।
समय को पहचानो-कविता में कवि इंसान के दुस्साहस के परिणाम भुगतने के लिए आगाह कर रहा है।
सूरज को हथेलियों से मत ढांको।/हवा को मुट्ठियों में मत बांधो।/खुशबू को तहखाने में कैद मत करो।/इतिहास को दावत मत दो।/सूरज, जला देगा तुम्हारी हथेलियां। /हवा की जगह,/तुम्हारी मुट्ठियों में-/रह जायेगा सिर्फ शून्य।
सच भी तो है वर्तमान दौर में इंसान खुद को प्रकृति से बढ़कर समझने लगा है। अपनी हरकतों से खुद को भगवान के समकक्ष मान चुका है। उसकी इसी हरकत को मद्देनजर रखकर कवि ने कहा है कि औकात में रहो वरना वजूद ही मिट जायेगा।
आपकी प्रतीकों के माध्यम से अपनी बात कहने की शैली अद्भुत है। प्रतीक भी ऐसे चुनते हैं कि आपकी बात एक ही पल में समझ आ जाती है। आपकी ’कुछ नहीं’ कविता में आपने प्रतीकों के माध्यम से सटीक बात पहुंचाई है। चालाक टोपियां, हवा भरा खोखला सूट, अबोध धोतियां और मौन कलम; समाज के विभिन्न लोग हैं जिनके जीवन आपस में संबंधित हैं और वे एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। ये बातें सीधे सीधे वर्ग का नाम लेकर भी कही जा सकती थीं। जैसे चालाक टोपियां यानी नेतागण, हवा भरा खोखला सूट यानी नौकरीपेशा वर्ग। परन्तु उस वक्त ये बात उतनी मजेदार और आकर्षक नहीं लगती। कविता की ताकत अमिधा नहीं बल्कि लक्षणा और व्यंजना होती है। और इसमें निपुण हैं श्री सुरेन्द्र रावल जी। हर बात को आप प्रतीकों के साथ यूं कहते हैं कि आप उनके कथन को पढ़े बिना उसका अर्थ समझ ही नहीं सकते। उनके काव्य संग्रह ’काव्य यात्रा’ की तमाम कविताएं इसी तरह से लिखी गईं हैं। इसमें एक खास बात और है कि ये प्रतीक व्यंग्यात्मक शैली में लिए गये हैं, जो पाठक को कविता भूलने ही नहीं देते।