प्रकाश स्तम्भ

बड़ी गहमागहमी थी। हर कोई एक दूसरे से जोश से मिल रहा था। बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग इस पार्टी में शामिल थे। पकवानों की सुगंध दूर दूर तक आ रही थी। विभिन्न गंधों के बीच भी नमकीन और मीठे की गंध को पहचाना जा सकता था क्योंकि स्टाल में एक ओर केवल मीठा ही मीठा था, जहां से रबड़ी दूध खोवा की मीठी गंध उठ रही थी और दूसरी ओर चाट पकोड़े, आदि थे तो उस ओर से नमकीन नमकीन हींग मेथी गरम मसाले की गंध आ रही थी।
पास ही तंदूरी रोटी का तंदूर था वहां से गरम रोटी की गंध घी के साथ आ रही थी। कुल मिला कर आदमी का मन, लालच और मुंह, पानी से भरने के लिये जबरदस्त व्यवस्था थी। वहां उपस्थित लोग विश्वामित्र बने मन को संभालने का प्रयास कर रहे थे और पकवान कामदेवी बनकर नृत्य कर रहे थे।
हर कोई गर्मजोशी के साथ मिलता और चाहता कि जल्दी से पिण्ड छूटे तो मधुमक्खी बनकर मिठाइयों से चिपक जाउं। इन सबके बीच समस्या थी उपहार को देना! सागर जी का जन्मदिन था और वो बड़े से स्टेज पर खड़े थे। जहां तेज रोशनी, ताम झाम, भीड़ भाड़ थी। वहां पर जाकर उनको अपने हाथ पर थामा फूलों का प्यारा बुके और उपहार भी देना था, तब तो हाथ खाली होते, कुछ खाने पीने को!
और वहां पहुंचना भी एक कठीन दुरूह काम, लाइन लगी थी लोगों की, उन तक पहुंच कर उपहार देने वालों की।
जैसे तैसे निपट ही गया ये भी काम।
पुराने गीतों पर आधारित सॅक्सोफोन का संगीत बेहद ही आनंददायी था। तरह तरह के पकवान टेबल में रखे भगोनों से निकलकर पेट में जाकर सज गये थे और ये मन जो था निर्णय ही नहीं ले पा रहा था कि कौन सा पकवान किससे श्रेष्ठ है। इसके चलते लोग बार बार और खाने लग जाते।
खैर! लगभग आधी रात बीत चुकी थी। खाने बनाने और देखने वाले भी थक गये थे। अब सबकुछ ठण्डा हो चुका था। अब समेटा समेटी चल रही थी। टंेट वाले टेंट कुर्सियां, दरी आदि समेट रहे थे तो केटरर खाने पीने का बचा सामान। अब कुत्तों को भी अंदर मैदान में आने की परमीशन मिल गयी थी वे भी अपने लिये मोटा माल समेट रहे थे। अािखरकार सड़कों में घूमने वाले कुत्ते भी साफ सफाई में कम योगदान नहीं देते हैं।
सागर साहब अपने कर्मचारियों के साथ उपहारों को समेट रहे थे। उनके कुछ कर्मचारी अपने घर ले जाने के लिये पॉलीथिन की झिल्लियां पहले से ला रखे थे जिसमें वे महंगा आइटम भर रहे थे जितना वे भर सकते थे, भले ही घर ले जाकर फेंकना पड़ जाये।
आखिर सब अपने अपने घर पहुंच गये इस गहमागहमी के बाद।
आधी रात को ही सागर ने कहा।
’मोहन! इन उपहारों और नगदी की अभी के अभी सूची बना लो कल के लिये ये काम क्यों छोड़ना। कल फिर से धंधे पानी में लगना पड़ेगा। अभी के अभी निपटा लो।’
मोहन ने अपनी घड़ी देखी। घड़ी के पहले मोबाइल चित्कार उठा।
’कब आओगे तुम कब आओगे!’
वह ये धुन सुनकर शरमा गया जबकि रोज यही धुन बजती थी जब भी उसकी घरवाली का फोन आता था। एक ओर पत्नी थी तो दूसरी ओर अभी अभी सेठ का पेट भर गले तक खाया हुआ नमक था। आखिरकार नमक की ही जीत हुयी।
अबकी वो अपने नीचे के कर्मचारी को बोला।
’आधे घंटे में हो हो जायेगा। बैठो चलो। मैं चाय बनवाता हूं।’ इतना कह कर बगैर उत्तर की प्रतीक्षा किये वह फर्श पर बैठ गया। और फिर कापी में लिस्ट बनाने के लिये लाइन खींचने लगा।
बाकी सब भी बैठ गये और एक एक गिफ्ट का पैकेट खोलकर देखने लगे। जो सामान निकलता और पैकेट में जो नाम लिखा होता बताता जाता। मोहन एक नजर उस पर मारता और फिर कापी में नोट कर लेता।
तरह तरह की घड़ियों, कपड़े की प्रेस, फूलदान, डायरी, अंगूठी, पायल, फोटोफ्रेम निकले जा रहे थे। अनुमानित कीमत भी लिखनी पड़ रही थी ताकि समय पर उसी कीमत का उपहार लौटाया जा सके।
’अरे! इसमें तो आइना है। ये किसने दे दिया उपहारस्वरूप!’’ ये कह कर उसने उस उपहार की पेकिंग पर नाम खोजा। नाम लिखा था-’कबीर!’
और इसके आगे पीछे कुछ न लिखा था। मुंशी ने अपने रजिस्टर में कबीर लिखकर उसके सामने लिखा दिया डेढ़ फीट बाई दो फीट का आइना! लगभग साढ़े पांच सौ!
’सर! केसी कबीर ने ये आइना दिया है उपहार में।’
’अच्छा!’ कह कर सागर ने उस आइने की ओर देखा। और याद करने का प्रयास करने लगा कि आखिर ये कबीर है कौन ?
बहुत जोर देने पर भी उसे याद न आया कि ये कबीर आखिर है कौन! वह अपनी कुर्सी से उठकर उस आइने को अपने हाथ में ले लिया। साधारण सा था आइना! पर जाने क्यों उसने उस आइने को अपने बेडरूम में लगाने को कहा।
’और हां, अभी ही लगा दो। दो कील ही तो ठोकनी है।’
मोहन ने तिरछी नजरों से सागर को देखा और फिर उस आइने को देखा, उसे उन दोनों के बीच संबंध कुछ समझ न आया। उसने आंखों ही आंखों में अपने कर्मचारी को इशारा कर दिया आइना लगाने का।
वाकई में दस मिनट के भीतर आइना अपनी जगह पर लग गया।
उपहार में मिले सामानों की ढेरी एक ओर से दूसरी ओर बन गयी थी। मोहन बार बार घड़ी देख रहा था सुबह के चार बज रहे थे। उपहरों की ढेर की ओर देखा, बड़े उपहार तो निपट गये थे, अब कुछ लिफाफे ही बचे थे। वह सागर की ओर देखा, वो अपने किसी दूसरे काम में व्यस्त था। यानी मोहन को निपटा कर ही जाना था।
ट्रेन का हार्न सुनायी दिया। कोई कुछ बोलता कि सागर बोला।
’पांच बज गये। हावड़ा मुम्बई एक्सप्रेस का समय है। पता ही न चला पूरा दिन और पूरी रात ही निकल गयी। सुबह फिर आ गयी दूसरे काम करने को।’
मोहन उसकी बात सुनकर अपने सर पर हाथ रख लिया।
जैसा कि काम तो खत्म होना ही था तो काम खत्म हो ही गया। सब अपने अपने घर पहुंच गये। सागर भी कुछ समय के लिये लेट गया। उसकी पत्नी राधा, बेटी और बेटा सबके सब सो चुके थे बल्कि पत्नी का तो उठने का समय भी हो चुका था।
सूरज अपनी आंखें खोलकर कोने कोने में ताक झांक करना शुरू कर दिया था। एक तीखी किरण सागर की आंखों में भी पड़ ही गयी। उसने लगभग बंद आंखों से घड़ी की ओर देखा…और झटके से उठ बैठा। साढ़े आठ बज चुके थे। वह सीधे बाथरूम में घुस गया। दस मिनट भी न बीते वह बाहर भी आ गया। कपड़े पहन कर कंघी करने लगा।
सर पर कंघी घुमाता हुआ वह अपने चेहरे को देख रहा था। चेहरा चमक रहा था आंखों में भी चमक नजर आ रही थी। वह खुद को ही देखकर मुस्कराया।
उसके मुस्कराते ही आंखों के किनारों पर झुर्रियां दिखाई पड़ीं। उसका मुस्कराना एकाएक रूक गया।
’कल ही तो मेरा जन्मदिन था। कितने उत्साह से मनाया था और आज ही चेहरा झुर्रियों से भर गया!’ वह आप ही बड़बड़ा उठा।
उसी समय पत्नी भी आ गयी। ट्रे में चाय और बिस्कुट थे और एक गिलास पानी। उसने मुस्कुरा कर उसकी ओर देखा। एक हसीन सी मुस्कान फिर से चेहरे पर आ गयी।
’आज भी तुम वैसी की वैसी ही हो, जैसी हमारे विवाह पर थी।’
’कैसी ?’ पत्नी ने भी मुस्करा कर पूछ लिया।
’देखो, आओ हमारी परफैक्ट जोड़ी।’
हाथ पकड़ कर आइने के सामने ले गया।
आइने में दोनों की छवि एक साथ नजर आ रही थी। मुस्कराते चेहरों में अचानक चुप्पी सी छा गयी।
आइने पर बनी छवि में दोनों की हाइट में लगभग छ इंच का अंतर साफ दिख रहा था। पत्नी दो इंच ज्यादा लम्बी थी। सागर चौंक गया ये अंतर देख कर। अठारह बरस बीत गये साथ रहते रहते, विवाह के वक्त से देख रहा था, पर ये उसकी हाइट को क्या हो गया था ? कैसे उसकी हाइट कम हो गयी या फिर उसकी पत्नी की हाइट बढ़ कैसे गयी ?
उसने आइने में पत्नी की ओर देखा उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे चेहरा सपाट था। वो शायद किसी सोच में डूबी हुई थी।
घर्र घर्र….! उसका फोन बजने लगा था। वह चौंक गया।
नंबर देखते ही उसे कुछ याद आया और वह बगैर चाय पानी बिस्कुट के निकल गया।
पत्नी सोच रही थी ये आज अचानक क्या हो गया। पहली बार ऐसा हुआ कि पतिदेव बगैर कुछ लिये चले गये।
आइने की ओर देखकर अपने बालों पर हाथ फेरा।
उसका चेहरा कुछ अजीब सा लग रहा था। उसे समझ नहीं आया कि आखिर क्या हुआ है, कैसा परिवर्तन हुआ है जिसके कारण उसका चेहरा अजीब लग रहा है।
उसने ध्यान से देखा उसके चेहरे पर जरा भी रौनक नहीं थी। गले और कान के सोने के जेवर जरा भी उसके चेहरे पर जंच नहीं रहे थे। उसने फिर से अपने बाल संवारे। चेहरा अपने पल्लू से पोछा। उसकी छवि में कोई परिवर्तन न आया।
वो एकाएक परेशान हो उठी।
’राधा मैडम! पानी लाउं क्या ?’ सुबती ने पूछा।
चिहुंक उठी वह आवाज सुनकर। अभी तो वह एक अन्य दुनिया में पहुंच चुकी थी। उसने सुबती की ओर देखा। उसके चेहरे पर भी परेशानी दिखायी पड़ रही थी। जरा ध्यान से देखने पर उसका चेहरा चमकता हुआ दिखायी दे रहा था। छोटे छोटे कान के फूल थे पर उसके चेहरे के साथ जबरदस्त मैच कर रहे थे। कुल मिलाकर साधारणता में भी सौन्दर्य देखते बनता था।
’तुमसे कितने बार मैने कहा है कि मेरे बेडरूम में आने के पहले आवाज दिया करो। तब भी तुम मेरी बात को अनसुना करती हो। अगर तुमको मेरी बात नहीं माननी है तो ये महीना आखरी समझो।’
सुबती चुपचाप वापस चली गयी। उसे मालूम था अपनी मैडम का कर्कश स्वभाव। पिछले दो बरस से उसे इन बातों की आदत सी हो गयी थी। पहले पहल हफ्ते दो हफ्ते में चिल्लाती थी मैडम तो अब रोज के रोज।
रूखा व्यवहार झेलना तो उसके खून में ही था। उसकी मां भी ऐसे ही किसी सेठ के घर काम करती थी।
पर आज वो आज सोच रही थी कि मैडम को आखिर क्या हो गया है जो इतनी परेशान लग रही है। तभी उसे याद आया चावल का कुकर लगा कर आयी है। वह लगभग दौड़ती हुई किचन चली गयी।
सुबती के जाते ही राधा अब सुबकने लगी। वह तनाव में बुदबुदा उठी।
’आखिर मुझे हो क्या गया है ? चेहरा अचानक बदसूरत हो गया।’ तभी उसका मन बोला ’बिल्कुल मन की तरह हो गया है चेहरा।’
’क्यों मेरे मन को क्या हो गया है ? क्या वो भी इतना ही बदसूरत है ?’ उसने अपने मन से पूछा।
’सोचो न तुम खुद ही। अभी कुछ पल पहले की याद करो। कैसे भभक रहा था तुम्हारा मन।’
’तो क्या नौकरानी को भी गले लगा कर रखूं ? जिसकी जितनी हद है उतने में रखना चाहिये। वरना वो सर पर चढ़ जाता है।’
’कभी इंसान को इंसान समझा था तुमने ? घर के नौकर तो मान लिया तुम्हारे खरीदे हुये गुलाम हैं पर क्या बाहर के लोग! क्या वे भी तुम्हारे गुलाम हैं ? कितना काला बोलती हो तुम! और फिर इसका अहसास भी नहीं है तुमको। छी कितनी गंदा चेहरा और गंदा मन बना रखा है तुमने। कभी कभार उसे छाड़ पोंछ भी लिया करो। हर किसी के साथ मानवीय व्यवहार रखो। तब तो तुम्हारा मन साफ सुंदर होगा।’
’हुंह! तुम कौन होते हो मुझे समझाने वाले। मेरे पास धन दौलत सबकुछ है तो फिर घमण्ड क्यो ंन करूं! जिके पास दिखाने को जो होगा वही तो दिखायेगा न!’
’बाप रे! कितना गंदा मन है। कैसे सुंदर चेहरा होगा!’
राधा झटके से उठी और किचन की ओर चल पड़ी।
वहां सुबती अपना काम कर रही थी।
’छरहरी है।’
’गरीब है तो कहां से मोटी होगीद्व मरगिल्ली!’ राधा मन ही मन विचारी।
’सांवले रंग के बावजूद सुंदर लगती है।8
’ये सुंदरता नहीं, गरीबों के प्रति दया के भाव हैं। न तो पावडर न ही क्रीम, उखड़ा उखड़ा सा चेहरा।’
राधा का मन लगातार दौड़ भाग करता ही रहा।
सागर का काम निपटते निपटते आज का दिन ही बीत गया। सुबह से जो पानी उसके मुंह में ब्रश करते समय गया था वही दिनभर में मिला था। वह अपने आफिस की कुर्सी में बैठा हुआ सुबह से लेकर अब तक के समय के बारे में सोचने लगा। सिलसिलेवार विचार करते हुये उसकी सोच अपनी छवि पर ठहर गयी थी।मात्र बयालीस बरस में ही बाल पकने लगे।
’इतनी जल्दी ?’ उसके मुंह से बुदबुदाहट निकली। ’समय का चक्र इतनी तेजी से गुजर रहा है कि मैं समय से पूर्व ही बूढ़ा होने लगा। इतनी जल्दी ?’
वह कुर्सी से झट से उछल कर खड़ा हो गया। परेशान सा अपने चेम्बर में टहलता रहा।
’जो भी आपकी आवश्यकता है बताइये, मैं दे दूंगा पर काम मुझे ही मिलना चाहिये।’
’ये टेण्डर मेरे हाथ से निकलना नहीं चाहिये, इसके लिये साम दाम दण्ड भेद सबकुछ जायज है।’
’अरे! छोड़ो, काहे की दोस्ती यारी! पैसा हो तो लोग आगे पीछे घूमते हैं। तुम उसके बिल को एज ए कस्टमर ही बनाना।’
’मेरे पास समय कहां है मां, तुम मेरे पीछे पड़ी हो, मैं नहीं जा सकता मौसी के घर। जिसे मरना था वह मर गया, क्या मेरे वहां खड़े होने से वो वापस जिन्दा हो कर आ जायेगा ?’
’मुझे माफ करो, मैं आज तुम्हारे संग होटल नहीं जा सकता। तुम तैयार हो गयी हो तो बेटे के साथ कहीं चली जाओ नहीं तो किसी सहेली को बुला लो। मेरा इंतजार मत करना।’
सागर का दिमाग भनभनाने लगा। तरह तरह की बातें उसे याद आ रही थीं। जाने कौन कौन से क्षण याद आ रहे थे।
वह चकित सा इन सारी बातों को याद करके अविश्वास से सोच रहा था कि कोई व्यक्ति ऐसा भी हो सकता है ?
’पर इस सबमें गलत क्या है ? हर किसी को कमाने के लिये कुछ न कुछ करना ही होता है। हर बड़ी मछली छोटी मछली को निगल ही जाती है। मैं न करूं ये सब तो कोई और करेगा। दुनिया से ये सब बंद थोड़ी हो जायेगा। तो फिर मैं ही क्यों विचार करूं इस संबंध में ?’
सागर का दिमाग धड़ाधड़ चल रहा था। किसी आटोमेटिक मशीन की तरह विचार उगल रहा था।
खिड़की के बाहर अंधेरा बढ़ गया था। शहर में जल रही बिजली की लाइटों ने उजाले का स्थान ले लिया था। उसके ऑफिस के कर्मचारी शायद अपने अपने घर जा चुके थे। मंुशी बार बार अपनी घड़ी देख रहा था। जबकि उसे मालूम था कि घर जाने का समय निर्धारित नहीं है। अचरज उसे इस बात का था कि सागर अब तक एक बार भी बाहर नहीं निकला था अपने चेम्बर से। पर उसके नाच कूद मचाने की उसे लगातार जानकारी मिल रही थी, भीतर से आती आवाजों से।
’सर! कुछ लाउं क्या ठण्डा या पानी वगैरह।’ आखिर जब उससे सागर की बेचैनी सहन न हुई तो चेम्बर में घुसकर वह पूछ बैठ। प्रत्युत्तर में सागर चुप ही रहा और उसे देखता रहा। मुंशी सकपका गया उसकी इस हरकत पर। कुछ ही पलों में संभल कर वह पुनः पूछा।
’सर! सर घर चलें। आप आज दोपहर का खाना खाने भी घर नहीं गये हैं। मैडम इंतजार कर रही होंगी।’
सागर तुरंत खड़ा हो गया। चल पड़ा।
’तुमने एक बार भी फोन नहीं किया मुझे खाने के लिये ?’ घर में घुसते ही राधा से पूछा।
राधा उसे आंखें फाड़े देख रही थी। सागर के पूछने पर ही उसे याद आया कि सच, दिन भर से एक बार भी फोन नहीं किया उसे। अब बताती भी तो क्या बताती। उसका मुण्डा सुबह से सनका हुआ है।
’कुछ नहीं बस यूं ही, फोन नहीं कर पायी। तुमने भी तो घड़ी पहन रखी थी तुम ही एक बार फज्ञेन लगा लेते।’ उसके मुंह से यंत्रवत सा निकल गया। फ्रेश होने के लिये बाथरूम में घुसता हुआ सागर रूक गया और राधा की ओर ध्यान से देखने लगा। अजीब लगा उसे ये व्यवहार। इससे पहले कभी ऐसा नहीं कहा था राधा ने।
बाथरूम से निकल कर अपना चेहरा पोंछा। अब जरा हल्का लग रहा था। तभी उसकी नजर आइने पर गयी।
आइने पर किसी बुजुर्ग की सी छवि नजर आ रही थी। उसने चश्मा लगाया और आइने की पास आया।
वह उछल कर छत से ही टकरा जाता।
ये छवि तो उसकी ही थी। एक रात से सुबह में और सुबह से शाम में ही उसका चेहरा इतना ज्यादा परिवर्तित हो चुका था। झुर्रियों से भरा हुआ। वह सर पकड़कर बैठ गया।
तभी किचन से आवाज आई।
’खाने आ रहे हो कि वहीं लेकर आउं ?’
वह बीमार सा उठ खड़ा हुआ और चल पड़ा किचन की ओर। राधा ने उसके आने की आहट मिलने पर खाना शुरू कर दिया था। सागर उसे देखता ही रहा। उसे राधा बदली बदली सी लग रही थी। रोज उसके इंतजार में बैठी रहने वाली गपगप खा रही थी। वह कुर्सी खींचकर बैठ गया और खाना खाना शुरू कर दिया।
एक कौर मुंह में डाला। और कमरे में नजरें घुमाया। परिवार के और सदस्य नजर नहीं आने पर वह पूछना चाह रहा था। पर चुपचाप खाना खाता रहा। पेट में अनाज जाते ही जरा सी ताकत आयी और दिमाग को आराम मिला। उसका खाना पूरा हो चुका था। हाथ धोने के लिये वाश बेसिन की ओर गया। हाथ धोकर उसे कुल्ला करने की आदत थी। वह कुल्ला करने के लिये मुंह ऊपर किया, उसकी नजर वाश बेसिन के आइने पर पड़ गयी। वह चौक पड़ा। आइने में उसका चमकदार, रौब-दाब से भरा हुआ चेहरा नजर आ रहा था। वह विश्वास नहीं कर पा रहा था कि ये कहां गया जो सुबह से उसके चेहरे चिपका हुआ था। वह बार बार अपने चेहरे को छू छूकर देख रहा था।
उसकी ये हरकत देखकर राधा उसकी ओर आई और पूछने पड़ी।
’ये पागलों की तरह आखिर तुम कर क्या रहे हो ?’
’देखो, तुम भी देखो। मेरा चेहरा जवान है बिना सफेद बालों का, बिना झुर्रियों का।’ वह उसका हाथ पकड़कर आइने के सामने ले आया। वह भूल गया कि राधा तो उसे यूं देख पा रही है। ’तो तुम्हारे चेहरे पर झुर्रिरूां थी हीं कब ? और सफेद बाल भी तो नहीं हैं। पागलों की तरह बातें कर रहे हो तुम तो।’ अपनी टेंशन में फंसी राधा चिड़चिड़ा उठी। इस बीच उसने आइने में सागर को देखा और वह भी दिख गयी। अबकी उसकी बारी थी चौकने की।
’अरे! ये मैं हूं ? सुबह तो एकाएक बदसूरत सी दिख रही थी। अब कैसे मेरा चेहरा ठीक लग लग रहा है।’
’क्या तुमको भी ऐसा ही कुछ लगा रहा था ?’ सागर चिहुंक कर पूछा। पांच मिनट में ही सुबह से बीत रही बातों को दोनों ने आपस में साझा किया। सागर उसे टोकता हुआ बोला।
’तुमने भी बेडरूम में लगाये आइने में अपना चेहरा देखा था और मैंने भी वहीं देखा था। हो न हो उसी आइने में ही कुछ गड़बड़ है।’
’मुझे भी ऐसा ही लगता है। चलो अभी चेक करते हैं आइने को।’
एक ही पल में दोनों बेडरूम में थे आइने के सामने।
वो दोनों आइने को देखते ही आश्चर्य में पड़ गये थे क्योंकि आइना तो था पर वो अब छवि नहीं दिखा रहा था बल्कि उसमें कबीर की छवि बनी हुई थी। कबीर का चित्र बना हुआ था।
सनत सागर
