हलबी कहानी – सुश्री उर्मिला आचार्य

एनकू दादा

ये गांव चो लोग हुन्ह गांव गेलो। हुन्ह गांव चो लोग ये गांव इलो।
असनी गोटोक दिन सात गाव चो आगर दादा एनकू इन इलो। एनकू दादा सुनार आये। रूनझून बाजली। संगे इलो ताजी-तबाली बाजली सोना, रूपा, सुमरी नंदी-पहाड़ जितलो। एउन-एउन भाटा थाने अमरलो। दखलो-काय सुंदर सोरसों फूल….हाय अब्बड़ सुंदर…। हरिख आने उठलो हाय-हाय मोचो सोनार फूल मिरलो। लहरा आने काय सुंदर लहरालो। हरदी असन, सोना असन दखली।
मान्तर सुनर फूल काय आने नयेन्दे झोता नाई, थान नाई, काय आने नयेन्दे। ’एनकू चो दुविधा दखेदे सोनार फूल बलली- रहा-रहा दादा अबे माली आएन्दे, झोला थाने संगाएन्दे।
सोनार फूल चो गोठ के सुनी एनकू दादा गालेे हाथ दिले। ’रूख, पतर बले गोठान्दे जानी एनकू गाले हाथ दिली।’ फेर सोरसो फूल ने सांगले-‘मुई सतरा घरे जाएन्दे, पेज पसिया खाएन्दे अऊर सोनर फूल तुके नएन्दे।
एनकू दादा सतरा घरे भाबुन भाबुन गिले-मुई कसन-कसन गहना बनाउन्दे-कान चो बाली, हाथ चूड़ी, बाहटा, टोटी चो सरसो माला, नाक चो फूली जम्माय बनाएन्दे, गोड़ चो पैडी, ए कसन बनाएन्दे रूपा…..। रूपा कोनती आनेदे।
रेंगते-रेंगते भाबुन भाबुन बेर बुड़ला। घामे ने भूख लागली, चुआ चो पानी पीएन्दे आवरी तोरी खाएन्दे। हाय…काय मीठ ागली। हाय-काय मीठ लागली…।
रूख लगे बस करी देखेन्दे कचरा थाने कानी बाटे टेमरू छाती मिरती फूट्टू डून्दी मिरली पंडरी-पंडरी दिखली। रूपा डगराय-डगराय पंडरी-पंडरी दिखली। हाय काय मजा इलीरे हाय मजा इली रे….।
रूपा असन ढुंढी के पयड़ी और बाहटा बनान्दे।’’ एनकू के खुबे हरिख लागली।
फेर सतरा घरे खाऊन आसी इलो सोनरे फूल अऊर टेमरू ढूंढी के झोला ने भरली। मऊआ रूख तरे बसी करे ताजी-तवालो काडलो फेर कान चो फूल नाक चो लवंग ढ़लो। फेर हुन्ही ने पयड़ी अऊ बाहटा गढ़ली।
एनकू दाद हरिख आने उठलो गांव चोपाल लगे बसलो। कोनी खोसा ने नीलो कोनी जुड़ा थाने नीलो कोनी पयड़ी रखलो।
काय सुनदर गहना…..जनमन के हरिख लागली। एक जोड़ी करनफूल नाक चो लवंग गोड़क पयड़ी अऊरी बाहटा एनकू बायले बिती काजे लुकाय करी संगाली।
हरिख-हरिख एनकू दादा सोनर फूल अऊर फूटू दुड़ी चो नाव गुनी-गुनी अपन गांव गेली।
छ गांव देऊन भाति अपन गांव अमरली। गहन बिकुन-बिकुन भाति रूपिया पइसा गांजा आने भरली।
रूपिया पइसा ने अऊर गहना बनाऊन बिकली अऊर खुबे पइसा कमाइली।
सपना दखी -दखी सोचली-सुनर फूल टेमरू सावन ढुंढी तुमी आमके खूबे साकार बनाली।
’’सोनर फूल, टेमरू छाती’’ मोके सावकार बनाली।

उर्मिला आचार्य
पंचरास्ता चौक
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