लाला जगदलपुरी जिला ग्रंथालय का बस्तर के साहित्य के विकास में योगदान
हर क्षेत्र के साहित्य व और साहित्यकारों के विकास में सीनियर साहित्यकारों के योगदान को हर कोई समझता है परन्तु कोई ये समझ नहीं पाता कि इस विकास की नींव में ग्रंथालयों और साहित्यिक पुस्तकों की दुकान के योगदान को नहीं देखा जाता है।
वास्तव में साहित्य के विकास में एक साहित्यकार की मेहनत का योगदान होता है ठीक उतना ही साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं और पुस्तकों का भी योगदान होता है।
एक साहित्यकार अपनी कल्पना शक्ति के प्रयोग से और वास्तविकता के दर्शन से अपनी कलम चलाता है। इस कलम से समाज के हित और मनोरंजन के लेख कहानी कविताएं आदि निकलते हैं।
माना कि लेखक अपने वर्तमान का पूरा पूरा उपयोग करके लिखता है पर क्या वह पूरी दुनिया का सच होता है ? पूरी दुनिया का वर्तमान होता है ?
जी नहीं!
पूरी दुनिया का वर्तमान जो होता है वह होता पत्र पत्रिकाओं और पुस्तकों में। देश जहान में किस विषय पर चर्चा है किस विषय पर चिंतन है ये सब होता लिखित लेखन में जो पुस्तकों के रूप में होता है।
और यह सब प्राप्त होता है हमें लाइब्रेरी और पत्रिकाओं की दुकान पर। लाइब्रेरी या ग्रंथालयों में देश के तमाम लेखकों की हर विधा पर लिखी पुस्तकें प्राप्त होती हैं। जिनके अध्ययन से हम अपने लिखे साहित्य की तुलना करके अपने लेखन का स्तर जान सकते हैं।
वास्तव में लेखन स्वप्रेरित ही होता है बावजूद इस बात के लेखन के नियमों और लेखन में विस्तार की जानकारियां पुस्तकों से ही मिलती है। जिस तरह हम लेखन करते हुये एक नया अनुभव करते हैं ठीक उसी तरह हमसे पहले जिन्होंने लिखा है उनके पास भी अनुभवों की खदान होगी।

अगर हम हमसे पहले लिखे गये लेखन का अध्ययन करते हैं तो हम उनके लिखे से आगे की सोच कर सकेंगे। क्योंकि पहली नजर में तो लगभग हर कोई एक ही चीज देखते हैं। अगर हम उनके लिखे हुये से चीजों के बारे में वो जानकाििरयां पहले लें ले तो हम फिर उसके आगे की सोच कर सकते हैं।
लाइब्रेरियां साहित्य के लिये अमृतकुण्ड की तरह होती हैं।
और अगर एक सामान्य ढंग से विचार करें तो पाते हैं कि लाइब्ररियां एक लेखक के लिये अत्यंत आवश्यक हैं क्योंकि इस लाइब्रेरी में जाकर ही एक पाठक लेखक के लिखे को पढ़ता है। अगर पाठक ही नहंी हैं तो एक लेखक की क्या महत्ता। इसलिये एक लेखक के लिये लाइब्रेरी भगवान की तरह है। लाइब्रेरी पाठक तैयार करने की फैक्टरी है।
लाइब्रेरी का योगदान साहित्य के विकास के लिये अकल्पनीय है। पाठक के निर्माण, लेखक के मार्जन और समाज में विचारों के विस्तार के लिये लाइब्रेरी का विकास आवश्यक है।
ये तो हुई लाइबेरी के योगदान की। अब हम विाचार करें कि हमारे बस्तर में साहित्य के विकास में लाला जगदलपुरी जिला ग्रंथालय का क्या योगदान है ?
पूरे देश से कटा हुआ और जंगलों के बीच बसा हुआ ये बस्तर क्षेत्र दुनिया के विकास से कटा तो था ही और प्रकाश से भी दूर होते हुये ज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी ही रहा। इसका कारण यही लाला जगदलपुरी जिला गं्रथालय ही रहा। इस लाइब्रेरी में शहर के हर प्रबुद्ध साहित्यकार ने मेम्बरशीप ली। और यहां आने वाली लगभग प्रत्येक पुस्तक का अध्ययन किया। इन पुस्तक रूपी नेत्रों से यहां का प्रत्येंक बुद्धिजीवी देश और दुनिया से जुड़कर अपडेट रहा।
मैं आपको बताना चाहूंगा कि हमारे जगदलपुर के कहानीकार कृष्ण शुक्ल जी उस युग में देश की महान पत्रिकाओं में प्रकाशित होते थे जब जगदलपुर से सिर्फ एक ही बस रायपुर के लिये चलती थी उसी बस से डाक जाती थी उसी बस से लोग आवागमन करते थे। बाकी जमान बैलगाड़ी का था। आदरणीय कृष्ण शुक्ल जी उस युग में अपनी कहानियों के साथ पूरे देश में अपनी उपस्थिति जताते रहे। उनकी आधा सैकड़ा कहानियां देश की प्रसिद्ध और चुनिन्दा पत्रिकाओं में प्रकाशित हुयीं थी।
इसी लाइब्रेरी में लाला जी अपनी मंडली के साथ अखबारों से लेकर पत्रिकाओं और पुस्तकों का अध्ययन करते थे। हमारे बस्तर का कॉफी हाउस यही लाइब्रेरी थी। जहां देश और दुनिया के साहित्यकारों के लिये पर चर्चा होती थी।
इसी लाइब्रेरी का एक कमरा अनेक वर्षों तक साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र बना रहा। जसे लोग आकृति के नाम से जानते थे। जहां लालाजी अपने परममित्र श्री बी एल विश्वकर्मा जी के साथ अपनी कविताओं का प्रथम पाठ करते थे।
इस लाइब्रेरी में लालाजी, रउफ परवेज जी, लखमीचंद जैन, सुरेन्द्र रावल, लक्ष्मी नारायण पयोधि, त्रिलोक महावर, आदि के कावयपाठ और साहित्यिक परिचर्चाओं की गवाह बनी रही।
-सनत कुमार जैन
चित्र-अंतरजाल के सौजन्य से धन्यवाद सहित