कहानी – बाजार की औलाद -सनत कुमार सागर

बाजार की औलाद

अचानक भीड़ भरे बाजार में कलर कलर के बीच भयंकर सी घटना हुई, बेतरतीब बैठे लोगों का जखीरा था, हर और चिल्लाहटों का डेरा था, हर कोई जुटा था बेचने को अपना सामान, कोई बेच रहा था तो कोई बार बार चिल्ला रहा था। वह जितनी जोर से चिल्लाता, लोग दौड़े चले आते।
उस बड़े से बाजार में न जाने कितनी भीड़ थी दोनों ओर से, जितने खरीददार थे उतने ही दुकानदार थे, पर कभी कभी यूं महसूस होता कि खरीददार ज्यादा है दुकानदार कम! वह दौर उस वक्त का होता जब चिल्लाने वाले रोटी पानी लेकर चिल्लाने लग जाते।
सामान्यतः तो यही महसूस होता था कि बेचने वाले ही ज्यादा हैं। इतनी ज्यादा दुकानें हैं कि चलने को जगह ही नहीं हैं। इन दुकानों की भयंकर संख्या पर उनके द्वारा बाहर फैलाकर रखा माल अलग से रास्ता घेर रखा था। कभी कभी तो यूं लगता कि उनकी दुकान में तो इतना माल रखने की जगह तो हैं ही नहीं फिर इतना माल आ कैसे जाता हैं। कहीं कहीं धूल से भरे रास्ते थे, तो किसी किसी स्थान पर हमेशा ही गीलापन रहता था। या तो बाजार में बहने वाली नाली को बराबर रास्ता नहीं मिलता था तो वह बीच बाजार का रूख बना लेती थी, या फिर नाली से बाहर निकलने की ढाल सही नहीं थी इसलिये पानी भरा रहता, या फिर नीचे डले पाइप लाइन का लिकेज उस जगह को गीला रखने में हमेशा तैयार रहता।
खैर! भयंकर घटना थी बीच बाजार में, लोगों की आवाजाही में, सड़क चीरकर एक गंदी सी आकृति बाहर निकली। मानो कुछ पल को सारा बाजार रूक सा गया, धरती ने मौन धारण सा कर लिया. बिखरे बाल बढ़ी दाढ़ी, फटी जीन्स और गंदे से कपड़े पहना, दुनिया भर की माला और कड़े पहने हुए रह था।
उसके शरीर से आती विभिन्न प्रकार की गंध से समझना मुश्किल हो रहा था कि वह सुगंध या दुर्गंध। कुल मिलाकर अजीबो गरीब ताना बाना था उस धरती फोड़ शख्स का। कुछ पलों की उलझन के बाद लोग होश में आये। आंखे फटी और मुंह खुला था, उन सभी लोगों के सामने यही प्रश्न था कि वह है कौन ? उस अजीबो गरीब व्यक्ति ने भी उनके धैर्य का परीक्षण न करते हुए जता ही दिया।
‘‘मैं बाजार की औलाद हूं! बाजार की औलाद!’’

टेलीफोन बूथ पर एक बूढी औरत फोन पर बात कर रही थी।
‘‘बेटा! तू कब आ रहा हैं ?’’
‘‘मुझे लगता है मां, तू मर जाएगी तब भी न आ पाऊंगा, समय ही नहीं मिलता हैं।’’
’’इतनी मेहतन करनी पडती है तुझे बेटा ?’’
‘‘हां मां हां! देख मां! मैं तेरे मरने पर नहीं आ पाया तो कोई बात नहीं, मेरे दिल में इसका हमेशा मलाल रहेगा। मां मैं यहां इतना कमा लूंगा कि जब भारत आऊंगा तेरी चिता वाली जगह पर एक शांत चित्त मठ मंदिर बनवाऊंगा, जिसमें जो भी बैठेगा वह सदा ही खुश होकर जायेगा। तुझसे बातें करेगा, तेरा मन बहलायेगा, तुझसे बच्चों जैसी बातें करेगा। सच में उस मंदिर से तेरा बड़ा ही नाम होगा। हर ओर तेरा चमत्कार होगा, सब मूरत की सेवा करेंगें, पांव दबायेंगे हाथ दबायेंगे। देखना न मां!’’
‘‘सच बेटा तू इतना रूपया कमा लेगा!’’
‘‘मां! रूपया नहीं डॉलर! रूपये का कोई मोल होता है ? हमारे यहां तो रूपये से पैखाने के बाद शरीर साफ करते हैं, मां डॉलर ही सबकुछ हैं।’’
’’नहीं बेटा! ऐसा नहीं कहते! रूपये में महात्मा गंाधी की फोटो होती है वो हमारे पूज्य हैं। कम से कम ऐसा गंदा काम तो रूपये से नहीं करना चाहिए!’’ तभी मां की नजर बूथ के बाहर महात्मा गंाधी की मूरत पर गई, जहां एक कौवा बैठकर बीट कर रहा था।
’’बेटा! हमारे यहां तो ऐसा सिर्फ नासमझ ही करते हैं!’’
’’तो कब भेज रहा है डॉलर!’’

तभी आवाज आती है- ’’आलू ले लो आलू!’’
‘‘ऐ स्टुपिड! डिस्टर्ब करता हैं! हल्ला करता है! क्या है तेरे पास ? क्या कर रहा है ?’’
’’दिखता नहीं है आलू बेच रहा हूं!’’
’’कहां है आलू ?’’
‘‘ये देखो, ये वाला पचास डालर का एक है!’’
’’पचास डालर का एक आलू! पर ये तो अजीब दिख रहा है, सड़ा सड़ा गिलगिला बदबू मारता!’’
‘‘तो ये ले लो दो रूपया का एक किलो!’’
आलू बेचने वाला ठेले के नीचे से निकाल कर देता है। उसे हाथों में लेकर देखता है।
‘‘अरे! यह तो एकदम ताजे सुंदर और बढ़िया हैं। यही तो आलू हैं। दे दो एक किलो, पर इतना रेट डिफरेंस क्यों है?’’
’’यह इंडियन है बाबू साहेब इंडियन!’’
’’ये डर्टीमेन, तुमने क्या कर दिया, गंदगी पकड़ा दी मुझे। ये क्या इंडियन घटिया माल पकड़ा दिया। तुम साले कितना भी आगे बढ़ जाओगे पर रहोगे वहीं पीछे। डर्टी सोच रखे हुए! मुझे तो यही पचास डॉलर वाला आलू दे दो। पर ये इतना सड़ा सा क्यों हैं बदबू भी मार रहा है ?’
’’अरे भैय्या, ये जो दो रूपया किलो वाला आलू हैं न, उसे खूब सारा मंगा लेते हैं। जब वह रखे रखे सड़ने लगता है, जब उसका पानी बहना शुरू होता है, दूर से ही बदबू आने लगती है, तब उसे पचास डालर में एक बेचा जाता है।’’
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‘‘पचास रूपयें में, सिर्फ पचास रूपये में!’’ भीड़ में एक जवान लड़का, उसकी आवाज सबसे तेज थी। बाजार में उसकी की आवाज लपक पडे थे, वह आवाज लगाने वाला जुनून से भरा लग रहा था।
‘‘मात्र पचास रूपये में।’’
’’हां सर! हां सिर्फ पचास रूपये, वह भी घ्ंाटे भर का नहीं पूरी रात का, सिर्फ और सिर्फ पचास रूपया!’’
भीड़ बढ़ गई ऐसा सुनते ही हल्ला होने लगा।
‘‘अरे भाई! माल तो दिखाओ!’’ लोगों की उत्सुकता, अधीरता में बदलने लगी थी। माल बेचने वाला भीड़ को किनारे कर पास ही बूढ़ी सी पर बैठी औरत की ओर अपनी उंगली का इशारा किया। वह औरत मुस्कुरा रही थी उसके मुरझाये चेहरे पर पुता पावडर, और होठों यह पुती लिपस्टिक उसके व्यस्त होने का सबूत दे रही थी। अंाखों की बोझिलता उसके व्यस्त कार्यक्रम का आइना सा थी, जो अलग से दिख रहा था जो ताजी चमक रही थीं।
‘‘अरे! यह बुढ़िया!’’
‘‘बुढ़िया के भी पचास!’’
’’भैय्या! जाकर तो देखो, संतुष्टि न मिली तो पैसे वापस।’’
’’तू तो ऐसे बोल रहा है मानों रोज चढ़ता है।’’ एक ने तुरंत कहा।
’’ऐ हरामी की औलाद!’’ वह दलाल विक्रेता उस खरीददार का कालर दोनों हाथों से पकड़कर अपनी ओर खींचकर ऊपर की ओर उठाया। ’’साला कुछ भी बोलता है। सोचता समझता कुछ भी नहीं, साले वो मेरी मां है। समझा कि नहीं ?’’
‘‘गलती हो गई सर!, माफ करना पांव पड़ता हूं, आपके।’’ वह खरीददार पैरों पर गिरकर मांफी मांगने लगा, साथ खड़ा एक और खरीददार अपनी आंखें नीची करके बोला-’’ठीक बात नहीं है भाई! किसी की मां के लिए इतना गंदा शब्द नहीं बोलना चाहिए! मां बेटे का संबंध ऐसा घटिया होता है क्या ?’’

तभी एक आदमी प्रकट सा होता हैं अजीब सी वेशभूषा के साथ। शरीर पर तरह तरह के चश्मों को लटका रखा होता है, साथ ही चिल्लाता है।
’’चश्मा ले लो चश्मा, चमत्कारी चश्मा! निराला चश्मा! आपके सपनों को पूरा करने वाला चश्मा।’’
अपने चश्मे की तरह तरह से तारीफ करता, चिल्ला रहा था। उसकी आंखों में भी हरे रंग का चश्मा लगा था। उसे देखकर विक्रेता और खरीददार की भीड़ उसकी ओर लपकी। और उसके हाथ से चश्मा लेकर उलट पुलटकर देखा, फिर पूछा।
‘‘कितने का दिया मेरे भाई ?’’ दलाल ने पूछा।
‘‘मात्र पंाच हजार रूपये का है, विदेशी है, सुपर चीज है। आजमा कर तो देखो।’’
दलाल अपनी आंखों से चश्मा निकाल कर सामने करता है। दोनों चश्मे एक सरीके थे, जरा भी अंतर न था।
’’अरे! पिछले हफ्ते मुझे यही चश्मा साढे़ चार हजार में बेचा था, अब पांच हजार कैसे।’’ दलाल बोला।
’’अरे भैय्या! ये चश्मा उससे भी करामती है।’’
’’वो कैसे ?’’
’’इसे पहनकर मां, मां नहीं रह जाती है!’’

’’क्यों ? क्यों ? क्यों ?’’
’’क्या पिछले पच्चीस साल से अपना फिगर इसलिए ही संवार रही थी कि बच्चा पैदा करके खराब कर लूं ?’’
’’पर यह तो तुम्हारी विशेषता है, हर औरत की विशेषता है कि सिर्फ और सिर्फ वो ही मां बन सकती है!’’
’’तुम मर्दों ने अच्छा रिवाज बना रखा है, शादी करो, बच्चे पैदा करो और गृहस्थी संभालो।’’
’’यह रिवाज नहीं बल्कि जीवन जीने का विश्व का सबसे अच्छा सिस्टम है जिसे भारत ने दिया है सिर्फ भारत ने! इस घर गृहस्थी वाली शैली में बूढ़े मां बाप, बीवी बच्चे, भाई बहिन तो साथ साथ रहते हैं ही, साथ में पेड़ पौधे नदी, पहाड़ को भी पूज्यनीय बनाकर संरक्षित किया गया है। और ऐसा सिर्फ भारत में ही होता है।’’
’’तुम्हारी इन सड़ी गली परम्पराओं को ढोने के लिए मैंने तुमसे शादी नहीं करी है। नौ महीने तक पागलों के जैसे बच्चा ढोओ। मैं ऐसे अपने बेढंगे शरीर को लेकर कहां कहां घुमूंगी। और फिर अपनी इतनी मेहनत करके बच्चा पैदा कर लिया तो क्या गारंटी है कि वह मेरी सेवा करेगा, मुझे पालेगा वो बेटा मेरी इज्जत करेगा। हरगिज नहीं पैदा करूंगी मैं बच्चा। चाहे तुम मुझसे शादी तोड़ लो। मैं तुम्हारे शौक के लिए और अनिश्चित भविष्य के लिए अपना फिगर खराब नहीं करूंगी।’’
’’तो फिर तलाक के लिए तैयार हो जाओ।’’
’’तुम्हारे कहने पर मां बाप को अनाथ आश्रम में फेंक दिया, बहनंे ट्यूशन ब्यूटी पार्लर कर रही हैं। भाई सड़कांे पर मारा मारा फिर रहा है। और अब तुम मुझे बच्चा भी नहीं देना चाहती हो।’’

‘‘कोख ले लो कोख!’’ तभी आवाज आती है और पति पत्नी झगड़ा रोक कर उसकी तरफ लपक लेते हैं।
‘‘ये क्या बेच रही है जरा फिर से बताना ?’’ आदमी पूछा।
‘‘कोख बेच रही हूं साहब! अपनी कोख, बच्चा पैदा करने की मशीन!’’
’’ये कैसी बिक्री है ?’’ आदमी फिर पूछा।
’’बाबूजी! जिस औरत को बच्चा नहीं जनना रहता हैं या फिर जन नहीं सकती है, उनके लिए यह सुविधा है। हमारी कोख से पैदा करो और फिर बाद में बच्चा तुम्हारा।’’
’’तुम कैसे छोड़ देती हो बच्चा, नौ माह कोख में रखने के बाद! ममता रोकती नहीं है ?’’
’’पैसा लेते हैं भैय्या! पचास हजार रूपया मात्र!’’
’’पचास हजार रूपया! इस सड़े से बच्चे को पैदा करने का!’’ अबकी औरत बोली।
’’तो तू ही पैदा कर ले, अपना फिगर बिगाड़ना है।’’
’’सबकुछ लटक जाता है, पहले पेट और बच्चा देने के बाद मुंह, तब मिलते है पचास हजार समझी!’’ वह बोली।
’’कुछ तो कम करो, कुछ छूट दो।’’ आदमी ने सौदा पक्का करने की कोशिश करी।
’’छूट के बाद ही पचास हजार है। बंपर ऑफर है भैय्या! पांच रातें मेरे साथ फ्री है।’’ वह शरमा कर बोली।
’’और फिर बच्चा होने के बाद तीन महीने मैं ही दूध पिलाऊंगी।’’
एकाएक कोलाहल शांत हो जाता है। मानों सबकुछ रेत पर बना रहा हो।

कहानीकार
सनत कुमार जैन
जगदलपुर
मो-9425507942