बस्तर की प्रथम महिला शासक
बस्तर की प्रथम महिला शिक्षक
प्रबुद्ध पत्रकार साहित्यकार श्री राजीव रंजन के उक्त शीर्षक से फेसबुक में प्रसारित हुआ, तब लगता था कैसा यह अद्भुत शीर्षक था जिसमें बस्तर स्टेट की गौरवशाली विख्यात महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी और उनकी गुरु की बी माधवम्मा नायडू का संयोजन एक सिक्के के दो पहलू की तरह था। पुराने लोगों के दिलोदिमाग में यह बातें क्यों नर्हीं आइं जो इस युवा साहित्य सुधि के सामने आई। एकदम नया अप्रतिम तुलनात्मक संयोजन रहा। उनको जानने वाले लोग इस द्विपद नाम शीर्षक से आनंदित हुए। ये अद्भुत दो विभिन्न परिवेश स्तर को एक सिक्के की तरह ढालने का कार्य श्री राजीव रंजन जैसे बाजीगर ही कर सकते हैं। आत्मश्लाघी, दम्भी, अहंकारी लोगों को यह शीर्षक उद्भासित न कर पाए परंतु सात्विक, निर्मल, निश्चल लोगों को तो परितृप्त कर गया।
इस शीर्षक ने जंग लगे स्मृति कपाटों पर स्मृति प्रतिध्वनि की अर्गला सांकल की खट-खट से इस विषय में लिखने को बाध्य सा कर दिया। बस्तर महारानी, प्रथम महिला शासक प्रफुल्ल कुमारी देवी को अक्षर ज्ञान बाराखड़ी का परायण कराने वाली महिला बी माधवम्मा नायडू बस्तर स्टेट की प्रथम महिला शिक्षक थीं। उस समय, परिवेश में एक दक्षिण की महिला का अंग्रेजी ज्ञान तो ठीक परंतु हिंदी, उर्दू में निष्णात होना, विस्मयकारी ही लगता है। उनका नाम न शाला के अभिलेख में है न शाला में, परंतु जब शताब्दी समारोह इस शाला का मनाया गया तो उनकी तीन छात्राएं दिवंगत, उस समय जीवन्त प्रमाण या दस्तावेज की तरह उपस्थित रहीं। उनके संस्मरण में उनकी गुरु बी माधवम्मा नायडू थीं। ये महिलाएं श्रीमती सुनामणि रथ, श्रीमती चंदूमणि तथा श्रीमती प्रयागा शुक्ल थीं। शाला के उपलब्ध अभिलेख में एक अन्य दक्षिणी महिला इंदिरा जी का भी नाम है। आज उनकी यह तीनों छात्राएं दिवंगत हो चुकी हैं, परंतु बस्तर के पुराने घरानों में संस्मरण की तरह सुनने को मिलता है मास्टरिन अम्मा-माधवम्मा नायडू का नाम! उस समय जगदलपुर शहर उनको इसी संबोधन से जानता था, पुकारता था। शिक्षा अधिकारी स्वर्गीय श्री शिवराम दास उनकी धर्मपत्नी श्रीमती कौतुकमणि दास को भी उनकी बातें याद थीं। माधवम्मा की दिवंगत छात्राएं राजरानी बाई, पंडित सुंदरलाल त्रिपाठी की बहन श्रीमती तारुणीसिंह, सरस्वती श्रीवास्तव, दुबे परिवार की मातामही, प्रबुद्ध शिक्षाविद् श्री रामेश्वर प्रसाद की माता सुनामनि पांडे, सौहद्रा पांडे, चंद्रकला ठाकुर जब भी बैठती, अपने गुरु संस्मरण खजाने की स्मृति सिक्कों की खनखनाहट से शाम को देर रात में बदल देती थीं। स्वर्गीय सुंदर लाल त्रिपाठी, गंगाधर सामंत, गंगाधर दुबे, राजगुरु विद्यानाथ ठाकुर, राजवैद्य गंगाधर दास, रघुनाथ महापात्र उनके संस्मरण सुनाते थे। बस्तर इतिहास,
संस्कृति, राजपरिवार के लेखा-जोखा के दस्तावेज, एकमात्र लाला जगदलपुर थे, आज वे भी ब्रह्मलीन हो चुके हैं। ऐसी विलुप्त स्मृतियों को युवा राजीव रंजन ने फिर से साकार कर दिया।
माधवम्मा नायडू अपने बड़े भाई मुनि स्वामी नायडू तथा भावज महालक्ष्मी के साथ बस्तर आईं संभवत 1894 का समय था। मद्रास रेजीमेंट में अर्काट, श्रीरंगम चिंगलपेट से कई परिवार अमृतसर, लुधियाना तक गए। रेजीमेंट के टूटने पर यह परिवार कई शाखा में बंटकर लखनऊ, भोपाल, नागपुर, चांदा तक बसकर फैलते गए। माधवम्मा का परिवार चांदा, अहेरी होते हुए बस्तर के परलकोट जमींदारी तथा भोपालपटनम जमींदारी में बच्चों को पढ़ाने लगी। उसी समय बस्तर स्टेट की राजकुमारी प्रफुल्ल कुमारी देवी की शिक्षा दीक्षा के लिए महिला शिक्षिका की आवश्यकता ने उन्हें जगदलपुर में प्रस्थापित कर दिया।
उस समय जगदलपुर छोटा सा कस्बा था परंतु बस्तर स्टेट पूरे छत्तीसगढ़ में प्रख्यात था। शायद 1916 का समय था जब माधवम्मा राजकुमारी को पढ़ाने जाने लगीं। महल से उन्हें लेने टांगानुमा परदा लगी गाड़ी आती थी। बस्तर स्टेट छोटा जरूर था परंतु सभ्यता, संस्कार, साहित्य, राजसी शिष्टाचार में राजपरिवार का स्थान संभवतः छत्तीसगढ़ में सबसे ऊंचा था। बालिका महारानी को प्यार और सम्मान के साथ सभी ’बाबी धनी’ संबोधित करते थे। महारानी 6 या 7 वर्षीया थी। अंग्रेजी प्रभुत्व व गरिमा के अनुरूप फ्रॉक, गाउन पहनती, वहीं लहंगा पोलका भी पहनती थीं जो उनके दक्षिणात्य मूल का प्रतीक था। उनके गहने भी दक्षिणात्य गठन के होते थे। महारानी और उनके गुरु के बीच मधुर राजकीय सौजन्य मंडित संबंध रहा। महारानी, माधवम्मा को ’गुरुजी’ कहतीं, उस समय बहन जी, मैडम का प्रचलन नहीं था। राजकुमारी की पठन-पाठन सामग्री मुंबई, कोलकाता तथा इंग्लैंड से आती थी। एक से बढ़कर एक आकर्षित करने वाली पोर्सलिन की रंग बिरंगी प्लेटें, मनकों की, गिनती सीखने के उपादान होते थे। महारानी छोटी वयस से विनत्, विनम्र छात्रा रहीं। शिष्टाचार, संस्कार, राजकीय गरिमा स्वतः ही उनके व्यक्तित्व के प्रभासी आभामंडल को द्विगुणित कर जाते। नियत समय पर वह पढ़ने को तैयार रहती। प्रारंभिक शिक्षा के बाद भी गुरु शिष्या का संबंध नियमित बना रहा। महारानी का विवाह 1927 में हुआ। विवाह से पहले उन्होंने पूछा- ’गुरुजी! आप क्या करोगे ?’
गुरु ने महिला शिक्षा पर जोर देते हुए कन्याशाला चलाने की बात कही। महारानी ने अपने पिता रुद्रप्रताप देव द्वारा निर्मित भैरवगंज में बने भवन में कन्या शाला चलाने की आज्ञा दी। फलस्वरूप कन्याशाला का सूत्रपात हुआ और इस विद्यालय की प्रथम महिला शिक्षिका माधवम्मा बनीं। रियासती दौर में इस शाला में बस्तर के पुराने संभ्रांत परिवार की गिनी चुनी लड़कियां आती थीं धीरे-धीरे संख्या बढ़ने लगी। वर्तमान में यह छोटी-सी शाला, दो मंजिला भवन में परिवर्तित है।
महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी एक योग्य शासक, विद्या अनुरागी, दूरदर्शी प्रजावत्सल धर्मपरायण महिला थीं। अपने पिता की तरह महत्वाकांक्षी रहीं। अपने शासनकाल में अनेक योजनाओं का सूत्रपात उन्होंने किया। पिता की स्मृति में राजा रूद्रप्रताप देव लाइब्रेरी, टाउन हॉल, महारानी हॉस्पिटल, गेयर बाजार बनवाया। बढ़ते शहर को सुचारू रूप से चलाने के लिए टाउन कमेटी का निर्माण कराया। न्यायालय, राबर्टसन हाल, नया मोती महल बनवाया। जो निर्माण कार्य पिता ने किए थे उनके रखरखाव का समुचित कार्य, व्यवस्था पर ध्यान दिया। दशहरा भी शानदार होता था। महारानी जब रथ पर 1922 में पहली बार बैठी तो वो दशहरा अभूतपूर्व था, ऐसा बुजुर्ग बताते थे। रथ पर उनके साथ दो बालिकाएं भी बैठती थीं उनमें से एक उनके गुरु की शिष्या श्रीमती प्रयागा शुक्ला थीं वो महारानी की बालसखी थीं। दो तीन साल बाद यह प्रथा बंद हुई और इनका स्थान दो पुतलियों ने ले लिया। महारानी का राज्याभिषेक प्रयागा शुक्ला के पिता श्री तिवारी जी ने किया था।
बाद में अंग्रेज शिक्षक तथा महिलाओं ने भी उनकी शिक्षा-दीक्षा, राजसी अदब-कायदे की शिक्षा दी। बस्तर का राजपरिवार उन दिनों काफी समय तक लंदन में भी रहा। जो शायद छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई राजपरिवार न था जो पूरे ब्रिटिश राजसी अदब-कायदे से वाकिफ रहा हो। उनके पति लंदन में पढ़ाई करते थे। बच्चे भी लंदन, शिलांग में पैदा हुए। अस्वस्थता के कारण उन्हें दो बार लंदन भेजा गया। 28 फरवरी 1936 को निधन हो गया। बस्तर रियासत का एक स्वर्णिम अध्याय भी इसके साथ समाप्त हो गया। उनकी गुरू भी दूरदर्शी, महत्वाकांक्षी, अनुशासनप्रिय, बाल मनोविज्ञान की ज्ञाता थी। माधवम्मा ने पढ़ाना शुरू किया तो गिनी चुनी छात्राएं ही थी। जब संख्या बढ़ने लगी तो उनकी शैक्षिक गतिविधियों के साथ पाठ्येत्तर क्रियाकलाप पर भी अपना ध्यान केंद्रित करना प्रारंभ किया।
आज जैसी विहंगम योजनाओं के विभिन्न रूप दिखाई दे रहे हैं वहीं बिना किसी तामझाम, नाम, विशेषण के योजनाओं को सार्थक स्वरूप का अमलीजामा पहनाकर छात्राओं के सर्वांगीण विकास का प्रतिरूप बनाया। पढ़ो-कमाओ योजना का एक सूक्ष्म स्वरूप उन्होंने शाला में ही रखा। छात्राओं को खाली समय में कार्य की गरिमा महत्व से, सहज, सरल ढंग से परिचित करा, उसकी उपादेयता, प्राप्त परिणाम एवं प्रमाण के रूप में मन-मस्तिष्क में ठोस स्थाई स्वरूप प्रदान किया। शाला में नारियल की फांक, लड्डू छात्राएं अवकाश के समय बेचती थीं। मुनाफे के रूप में एक धेला मिलता, जो खजांची छात्रा के पास जमा होता। इस व्यवसाय से छात्राएं जहां कमाने का गुर सीखती, वहीं धनलोलुपता के बदले उनकी कलात्मक अभिव्यक्ति को दिशा मिलती। माकूल रकम जमा होने पर जरी, धागे, रंग-बिरंगे पोत, मनके खरीद कर उन्हें, उनसे धार्मिक चित्रावली, बनाना सीखाती। जिनमें देवी, देवता दशावतार, हिंदू आस्था के प्रतीक नारियल, तुलसी, पारिजात, कदली, वट, पीपल, हरसिंगार का चित्रण होता। छोटे-मोटे सिलाई का काम भी सिखाती। पूरा हिसाब किताब रखने का काम भी छात्राएं करती।
बाल विधवा होने के कारण जीवन में कहीं कुछ अतृप्ति थी, उसे मार्गन्तीकरण की सहज परमार्थ क्रियान्यवन की प्रक्रिया से प्रत्यावर्तित कर तृप्त होती थी। बस्ती के लोगों की आस्था विश्वास की वह ’लॉकर’ भी थीं। जहां न कोई स्ट्रांग रूम था न कोई गार्ड! उनकी खाट के नीचे कतारबद्ध पीतल की गुंडियों में लोगों के सोना चांदी के जेवर, दस्तावेज सुरक्षित रहते। जब भी कोई अपना माल लेने आता वो गुंडी जिसमें उसका सामान रखा होता उसे उलट देती और आदेश देती ’तेरा माल बीन ले, बाकी वापस रख दे।’ उनके इस स्ट्रांग रूम से मजाल है कि कील भी गायब हुई हो। इसका उल्लेख दिवंगता श्रीमती बैसाखू शाह जब तक जीवित रही दोहराती थीं।
अक्षय तृतीया के दिन बड़ी-बड़ी रक्त-चंदन की लकड़ी की गुड़ियों का ब्याह रचाती। उनके गले में पीले धागे में सोने का मांगल्य प्रतीक चिन्ह ’ताली या बोट्टू’ बांधती और किसी गरीब कन्या के ब्याह में दान कर देतीं। बड़ी-बड़ी लोहे की पेटियों में गुड़ियों का संसार था जिसे दशहरा में सजाती खाली समय में चुप नहीं बैठती महिलाओं को जमाकर कुंकु बनाना, पत्तल दोना खूबसूरती के साथ सिलना सिखाती। बाद बाद में उनकी छात्राएं भी उनके पास आती और यही सब सीखतीं।
महिला होते हुए भी पुरुषोचित धीर गंभीर व्यक्तित्व, लंबा कद, गोरा रंग, लंबा चेहरा, हल्के चेचक के दाग, शुभ्र धवल वस्त्रा थीं। दक्षिणी प्रथा के विपरीत सफेद बड़ी सी चादर लपेटे रहतीं। सभी अंग ढके रहते, शायद यह भोपाल के रियासती दौर का प्रभाव था। पान की शौकीन थी हमेशा पान का डिब्बा उनके साथ होता। भाई की अकाल मृत्यु अल्पवयसी, बूटे से कद की सुंदर अनुज बहू और एकमात्र भतीजे के साथ स्वयं टूटकर भी गृहस्थी को संवारती रहीं। दक्षिण से जो रिश्ता टूट-सा गया था, प्रारंभ किया उसे पुनः जोड़ने का सिलसिला। जगदलपुर से चिंगलपेट गांव तक जाने में 6 दिन का समय लगता था। बड़ा कठोर अनुशासन एवं नियमित दिनचर्या घर पर थी। सुबह नियम से दो संत दढ़ियल महाराज कमंडल वाले (स्वर्गीय विश्वनाथ महापात्र के पिता) महादेव घाट के राममूर्ति बाबा आते। उन्हें उचित आसन देकर बैठाना, धर्म-कर्म की चर्चा करना, नियम से ग्लास भर दूध, फलाहार देना। समसामयिक विषयों की चर्चा के बाद उनकी कठोर, कर्मठ दिनचर्या प्रारंभ होती। इन कार्यों में कहीं कोई चूक होती तो विधवा भावज की पीठ पर निर्मम छड़ी प्रहार से भी वो नहीं चूकतीं। तपस्वी सा जीवन, परोपकार, धर्म-कर्म, पूजा-पाठ, सदाशयता, अब तक बस्तर के पुराने संस्कारी, ईमानदार, सच्चे लोगों के बीच स्थापित कर सका है। दीन दुखी की सहायता करने सदैव तत्पर रहती।
अपने भतीजे को रायपुर भेजा पढ़ने, उनके साथ गंगाधर दुबे भी वर्तमान शासकीय हाई स्कूल रायपुर में पढ़ते थे। जगदलपुर से रायपुर पहुंचने में 10 दिन की का समय लगता था। वहां से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए अमृतसर भेजा। इंजीनियर बनाने का सपना चकनाचूर हो गया जब उन्होंने भतीजे को पुलिस की वर्दी में देखा। वह टूट सी गई, इस सदमे से उबरने में काफी समय लगा, ऐसा लोग बताते हैं।
1928-29 में वे रिटायर हुई। रायपुर स्थित अंग्रेज पोलिटिकल एजेंट से उन्हें पेंशन भी मिलती थी। 1936 तक ये पेंशन मिलती रही। संभवतः शिष्या महारानी प्रफुल्ल कुमारी देवी के निर्वाण के साथ वह भी बंद हो गई। ऐसे शिक्षकों के संस्मरण सुमरनी को हाथ में लेते ही अनेक परम श्रद्धास्पद गुरू साकार हो उठते हैं। श्याम धन गुरुजी, महावीर गुरुजी, प्रह्लाद गुरुजी, त्रिलोचन ठाकुर गुरुजी, बालगोविंद तिवारी गुरुजी, भिखारी राम गुरुजी, विमलेन्दु सर, रविशंकर दत्त सर, नत्थूलाल चतुर्वेदी (चौबे सर), जमुनाप्रसाद तिवारी सर, दाऊलाल दुबे सर, प्राचार्य देव सर, उमाशंकर तिवारी सर, पाध्ये सर, उनकी बहन पाध्ये बहनजी, सेन सर, मुखर्जी सर, सुरेंद्र चौबे सर, रमेश जोशी सर, वर्तमान में वाधक्य से नमित भार से इन सबके सद्गुणों को प्रतिनिधित्व करती एकमात्र श्रीमती कमला नाग बहनजी हैं। यह सभी कर्मठ वीतरागी साधुओं की तरह बस्तर के लोगों के मन मस्तिष्क में विराजित हैं।
आज शिक्षकों के सम्मान में कर्मयोगी, ज्ञानमूर्ति, सत्पुरुष की स्मृति में जो आयोजन किए जाते हैं मात्र वर्ष में एक बार 5 सितंबर को। शिक्षक दिवस का यह यंत्रवत, कठपुतली सम निष्प्राण, औपचारिक मंचीय परिवेशन चित्त को खिन्न अशांत ही करता है। वर्तमान में यह सम्मान राजनयिक द्वारा हो तो सात पुरखों की आत्मा तृप्त हो जाती है। वही लोबान, अगरू धूप सी मोहक पवित्र स्मृति सुगंध से, स्वनामधन्य शिक्षकों की देवोसम अलौकिक आभा से मन प्राण को शीतल ऊर्जान्वित करती है। शायद इसीलिए हम अपने धर्म कर्म एवं व्यवसाय को प्रांजल परिमलित, अक्षत रखने में सक्षम रहे। ऐसे गुरुजनों को जब भी याद करो सर बंदगी में झुक जाता है। माधवम्मा नायडू के बारे में ब्रह्मलीन दिवंगत व्यक्तित्व उनके बारे में बताते थे, दाऊ काशीप्रसाद, भुवनेश्वर प्रसाद अग्रवाल, उनका परिवार, श्रीमती पूर्णिमा अग्रवाल, क्रांतिकारी बिलख नारायण अग्रवाल की धर्मपत्नी, कचरूलाल दानी परिवार, जनाब इब्राहिम परकासेठ, मालगुजार सलाम साहब, उनके वालिद, हाजी सरदार खान, कंवरलाल सेठ, हिम्मतलाल दुग्गड़ सेठ, बुधमल लुंक्कड़ सेठ, मंगलप्रसाद बाजपेई, उनका परिवार, पाटनी कंपनी वाले पिल्ले, मुदलियार परिवार आदि।
बस्तर की प्रथम महिला शासिका ने अपने राजकीय परिचालन, सुनियोजन में अपनी मेघा, अद्भुत दूरदृष्टि से पूरे बस्तर में एक स्वर्णिम आयाम रचा, अपने राजवंश की ख्याति का परचम लंदन में भी फहरा आईं। वहीं उनकी गुरू अपने परिवेश में ही महिला शिक्षा की प्रेरणा बनीं। बस्तर जगदलपुर के पुराने सभ्रांत संस्कारी लोगों की श्रद्धेय रहीं। अपनत्व एवं प्रेम से लोग उन्हें मास्टरीन बाई कहते रहे। ऐसे व्यक्तित्व द्वय का स्मरण अतीत के गौरवशाली थाथी की तरह, मानस में अंकित है और रहेगा।

बी.एन.आर. नायडू
नायडू मेन्शन, मेन रोड़
जगदलपुर छ.ग.
मो.-9174448840