कौन सा लेखन एक अफीम है ?
किसी भी स्थान या क्षेत्र का इतिहास किस तरह लिखा जाता है आपने कभी विचार किया है ? इतिहास लेखन के वक्त वो सभी लोग तो होते नहीं हैं जिन पर लिखा जा रहा होता है। न ही वे परिस्थितियां होती हैं। तो फिर कैसे लिखा जाता है इतिहास ? पुराने मरे हुए लोगों की आत्मा को जाग्रत किया जाता है और उनसे सवाल पूछे जाते हैं ? कौन सा तरीका होता है इतिहास लेखन का ? सोचिये जरा।
जरा हम अपने घर के आसपास देखें, अपने परिवार मोहल्ले को देखें, जरा अध्ययन करें। कुछ पल्ले तो पड़ ही गया होगा आपको। हम अपने आसपास के लोगों से अपने परिवार के बुजुर्गों से सुनते हैं और अपने बाप दादा के बारे में कुछ जानकारी हासिल करते हैं। अपने मोहल्ले की जानकारी मिलती है कि यहां से इतनी दूरी पर जंगल था, यहां पर एक बड़ा पेड़ था, एक छोटा मंदिर था आदि। अपने पिता के पहले दादा की जानकारी जरा सी मिलती है। उनके जमाने की जानकारी जरा सी मिलती है। यूं हमारे घर और परिवार के साथ मोहल्ले का इतिहास पता चलता जाता है। उसके और पहले का कैसे पता चलता है ? सोचिए जरा।
विषय बदलते हैं। बस्तर के साहित्य ऋषि लाला जगदलपुरी जी ने कविताएं लिखी हैं, ग़ज़लें लिखी हैं। उन्हें कभी पढ़ा है आपने ? क्या लिखा है उन्होंने ?
मचल उठे प्लास्टिक के पुतले,
माटी के सब धरे रह गये।
जब से परवश बनी पात्रता,
चमचों के आसरे रह गये।
करनी को निस्तेज कर दिया,
इतना चालबाज कथनी में;
श्रोता बन बैठा चिंतन,
मुखरित मुख मसखरे रह गये।
आंगन की व्यापकता का,
ऐसा बंटवारा किया वक्त ने;
आंगन अंतर्ध्यान हो गया,
और सिर्फ दायरे रह गये।
और दूसरी कविता है –
देखो, सबेरा हो गया है
किसान खेत जा रहा है
सब तरफ मुर्गे बोले
सब तरफ ढेकियां बजी
उजाला पुकार रहा है
अंधेरा सब तरफ खो गया है
सितारों की हानि हुई है
देखो सुबह हुई है।
मछली, केंचुआ चबा रही है
बगुला, मछली निगल रहा है
ढोंढीया-सांप, मेंढकी पकड़ रहा है
सोनू दादा जाल फेंक रहा है
चिड़ियों के चहकते ही
देखो, सुबह हुई है।
बिस्तर कब छूट गया है
रास्तों को पांव मिल गये
लड़की पनघट चली गयी
पानी में लहरें उठ रही हैं
चुडैल रात नहीं रही
देखो, सुबह हुई है।
पहली कविता क्या बता रही है ? पहली कविता उनके वक्त को समझा रही है। वे जिस वक्त अपने साथियों के साथ बैठते थे और कविता पाठ आदि करते थे, अपने साहित्यकार मित्रों के साथ रहते थे, अपने जिस समाज में रहते थे उसका चित्रण है वो कविता। यानी उस वक्त कितनी बेइमानी थी प्लास्टिक के पुतले यानी नकली लोग उन लोगों से आगे हो गये जो मिट्टी के पुतले यानी जो मिट्टी से जुड़े हुए थे। चमचों के जयकारों से उस वक्त किसी की छवि बनती थी। और जो जमीनी काम करते थे उनको किनारे करके सिर्फ हल्ला करने वालों को, अखबारों में छपने वालों को महत्ता मिलती थी। जिनकी रचनाओं में चिन्तन होता था उन्हें किनारे करके उलजुलूल लिखने पढ़ने वालों को महत्व दिया जाता था, उनके हाथों में सभा की कमान होती थी। चिंतक बेचारे किसी किनारे में पड़े रह जाते थे और सुर्खियां उनको मिलती थी जो चालबाज होते थे। क्या ऐसा आज भी होता है ? कि सिर्फ पहले ही होता था ? सोचिए जरा।
दूसरी कविता क्या बताती है आइये जरा विचार करें। उस वक्त में लोग अलसुबह उठ जाते थे, किसान सुबह से ही खेत जाकर अपनी दिनचर्या में लग जाता था। और हरियाली थी, हर ओर तालाब थे, पानी की व्यवस्था थी जहां मछलिया रहती थीं। मौसम में सूखापन नहीं बल्कि बरसात हमेशा होती थी। तब तो केंचुए होते थे। पानी लेने के लिए तालाब जाना होता था। आदि आदि।
हमने इन दो रचनाओं और उनके विश्लेषण से जाना कि लालाजी के वक्त में जो लगभग सत्तर अस्सी साल पुराना हो सकता है तब के हालात कैसे थे, समाज कैसा था, लोग कैसे थे, साहित्यिक समाज का परिवेश कैसा था। आदि।
यही तो है इतिहास लेखन! अपने बच्चों के लिए, उन बच्चों के बच्चों के लिए, हम यही जानकारी तो छोड़ कर जा रहे हैं। अपनी पहचान अपने वक्त की पहचान छोड़ कर जा रहे हैं। हम और आप अपना वक्त अपनी रचनाओं में चित्रित कर रहे हैं। अपने चरित्र को अपनी अगली पीढ़ी को दे रहे हैं। कभी हम-आपने विचार किया है कि हम क्या लिख रहे हैं ? अपना कैसा चरित्र चित्रित कर रहे हैं ? वास्तविक चरित्र है ? अतिरंजित चरित्र है ? असली चरित्र है ? बनावटी चरित्र है ? क्या लिख रहे हैं ?
सिर्फ और सिर्फ घटिया परिकल्पनाएं वास्तविकता से दूर!
क्या हमारा लेखन यह नहीं समझाता है कि वर्तमान समय में स्त्री और पुरूष के बीच सामजंस्य की भयंकर कमी है ?
इस युग में पुरूष एक कामी व्यक्ति है जो औरत को देखकर अपने आपे से बाहर हो जाता है जानवर की तरह। क्या हमारे बाप-भाई, मामा-चाचा-बेटा, ऐसे ही हैं ?
क्या औरत को आज भी हमारे क्षेत्र में जानवर की तरह बांध कर बोली लगाई जाती है ?
क्या परस्त्री गमन एक सामान्य सी बात है ? या परपुरूष गमन एकदम आसान और स्वीकार्य है समाज में ?
कैसा चरित्र है हमारे समाज का जो हमने दिखाया है ?
क्या इस युग में लोग बिल्कुल ही बेइमान हैं ?
हर कोई साधु धर्म के नाम पर बलात्कार कर रहा है ?
क्या समाज में पाप करना स्वीकार्य है ?
आपकी सोच क्या है इस संबंध में, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि समाज में क्या स्वीकार्य है। ऐसे लेखन से वर्तमान तो नष्ट हो ही रहा है भविष्य के लिए भी हम अपने बच्चों को यही सीख देकर जायेंगे और जब-जब वह हमारे लेखन को पढ़ेगा तो वो यही मानकर चलेगा कि मेरा पिता तो कई औरतों के साथ संबंध रखता था इसलिए ये जायज है। कई युगों से ऐसा चल रहा है। मेरे पिता का पिता (बाप शब्द ठीक लगता है।) अपनी बीवी को जरूर मारता रहा होगा तब तो उनकी कविताओं में ऐसा ही कुछ नजर आता है। हमारे पड़ोसी अपनी लड़कियों को हमसे बचाकर रखते होंगे क्योंकि हर आदमी तो हैवान था। आदि आदि।
हमारे इतिहास को बड़ी ही कुटिलता से बदला जा रहा है। हमारी भारतीय सभ्यता को दूषित किया जा रहा है। और ये सब बड़े पैमाने पर प्रगतिशीलता के नाम पर साहित्यकारों के द्वारा किया जा रहा है। योजनाबद्व तरीके से अपनी लेखनी को बेचकर अपनी विचारधारा से, समाज के नये लेखकों को, अपनी विचारधारा में घुसाने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। हमको आपको अपनी संस्कृति के प्रति घृणा की हद तक ले जाया जा रहा है। हमें एक ऐसे विशेष चश्में से ही देखने को समझाया जा रहा है जो देशहित, समाजहित और संस्कृतिहित में अनुचित है। हमें जैसा लिखने को प्र्रेरित किया जा रहा है उससे भविष्य और खराब होगा। वो अपना एजेण्डा थोपने के लिए सरकारी राशि का सम्मान, सम्मानपत्र और अखबारों की सुर्खियां बांट रहे हैं। सरकारी लाइब्रेरियों को अपनी योजनाबद्व तरीके से लिखी गयी पुस्तकों को भर चुके हैं। शोध कार्यों को इस तरह से परिभाषित कर दिया गया है कि हम उनके पुराने लिखे को ही सर्वमान्य मानकर आगे बढ़ पाते हैं। कुछ नामचीन माने जाने वाले इतिहासकारों ने इतिहास को विकृत कर सांस्कृतिक अपराध किया है और हम साहित्यकार उनके चश्में पहनकर उनका ही जयकारा लगाने में खुश हैं। अपनी बुद्धि को एक किनारे रखकर, जो सामने दिख रहा है, उसे छोड़कर परिकल्पना लिख रहे हैं। भारतीय समाज को कलुषित समाज घोषित कर रहे हैं। देशभर की अनेक संस्थाएं अपनी विचारधारा थोपने के लिए गधों को भी ससम्मान सम्मानपत्र बांट रही हैं। उनका सम्मान बांटने का एकमात्र एजेण्डा है उनकी विचारधारा के प्रति आपकी स्वीकृति। आप किसी का नमक खाकर कैसे उसके विरोध में लिखेंगे। अपनी आंखें खोलिए। अपने देश के लिए लिखिए। अपने भविष्य के लिए लिखिए। अपने बच्चें के नैतिक मनोबल के लिए लिखिए। अपने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझिये। मात्र गली-कूचे के सम्मान के लिए अपनी सोच को मत गिराइये। किसी का दिया सम्मान आपका मान-सम्मान नहीं बढ़ा सकता है। आपकी कलम ही वो जादू कर सकती है। आजकल खुद पैसे देकर सम्मान खरीदे जाते हैं और खुद ही खबर बनाकर अखबार में छपवाते हैं। और फिर फेसबुक की वाल पर समाचार पत्रों को धन्यवाद ज्ञापित किया जाता है।
आपका लिखा एक एक शब्द आपके परिवार की अगली पीढ़ी को शर्मिन्दगी में भरता है या फिर आंखें उठाकर चलने को प्रेरित करता है वो आज ही आपको निर्धारित करना है।
चलिए देश के लिए लिखिए। नकली प्रतिशीलता के एजेण्डा लेखन को टाटा कीजिए। समाज के लिए सकारात्म्क लिखिए, सकारात्मक कीजिए। ज्यादा प्रगतिशीलता के चक्कर में अपनी संस्कृति और संस्कार को लात मत मारिये क्योंकि यही लात वापस आकर आपकी अगली पीढ़ी को पड़ेगी। सौ प्रतिशत सच है कि ऐसा लेखन किसी न किसी एजेण्डा को लेकर ही लिखा जाता है। और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ज्यादातर लेखक अपनी निजी जिन्दगी की कोफ्त को परोसते हैं। आप तमाम लेखकों को देखकर पढ़कर समझ सकते हैं। आइये हम ऐसे लेखकों का जीवन पढ़कर पन्नों पर उतारें और एक नेक काम चुपचाप करें।