काव्य – रजनी साहू ‘सुधा’

कीमती समान

निश्चय ही
मैं याद रखूंगी
यात्रा में मेरे
कीमती सामान,
सब अपने पास रखूंगी।
चेतना में स्मृति
परछाइयाँ प्रारब्ध की,
कर्म में क्रमबद्ध
एक कोशीय युग्मज
फिर बहुकोशीय
ऊतक, अंग
तरलता में तैर रहे थे।
नाल से नाल तक,
मणिपुर में क्रियायें,
ग्रंथियाँ भी उत्सुक थी
असीम वेदनाओं को
सहकर,
नवजीवन आया।
कोमल रीढ़ में
सुदृढ़ बल पाया।
सरीसृप सा रेंगता
चौपाया सा दौड़ता
अंत में दोपाया हो गया
मानव।
फिर काम, क्रोध, लोभ, मद, अहम्
वहम में भूल गया।
कर्म का सिद्धान्त,
जीवन की यात्रा का वृतांत
प्रारंभ से अंत तक
असंख्य शून्यों को
बढ़ाने के लिये शून्य सा
बटोरता रहा, अपना और
अन्य का कीमती सामान।

जनम-जनम के फेरे

जन्म से मृत्यु,
धर्म का आचरण
मृत्यु से जन्म तक
चेतना का आवरण।

असीम सत्ता का चयन
फिर होता पुनर्जन्म
विविध योनियों का
विश्व में वर्गीकरण।

जनम-जनम के फेरे,
मोहपाश के घेरे,
अंधकार घनेरे,
खुली आँखें हो गये सबेरे।

मानव तन पर तना,
कुछ तो भूमिका बना,
संचित कर्मबीज सींचकर,
मुमुक्षत्व पर कदम बढ़ा।

अंतिम विदाई

कभी मैं,
उतरती थी
तेरे मन के आँगन में
भोर की तरूण अंगड़ाई में।
दिन भर बातें करती
बागों की अमराई में।
शाम में दुल्हन सी सजती
स्वप्न से सुन्दर अरूणाई में।
रातों को चाँदनी सी छिटक जाती
सूनेपन को भरती तेरी तन्हाई में।
अब तेरे मन को घेरे
कंटीले काँटें चुभते बड़ी गहराई से
लहूलुहान अभिलाषाओं संग
लौट आती मैं,
उलझती दिन रात
अपने दर्द की भरपाई में।
गिनती की साँसें
गिनती आतुर अंतिम विदाई को।

समाधिस्थ संध्या

समाधिस्थ संध्या
ध्यानरत होती किरणें
आराध्य आदित्य
अस्त और उदित
सात अश्वों सहित
वयस्त धारणायें
आतुर होने को
सृष्टि में समाहित।

रजनी साहू ’सुधा’
मुम्बई
मो.-9892096034