लेखकों से निवेदन
वैसे तो साहित्य की तमाम विधाएं महत्वपूर्ण हैं किसी भी विधा को कमतर नहीं आंका जा सकता है परन्तु गद्य और पद्य के बीच संतुलन आवश्यक है। वर्तमान दौर में एक सामान्य सी बात हर ओर सुनने आती है कि व्यक्ति के पास समय ही नहीं है इसलिए उपन्यास के बाद कहानियों और बड़े लेखों का भी दौर खत्म हो चुका है।
क्या यह वास्तविकता है ? नहीं, बिलकुल नहीं। यह तथ्य सत्य नहीं है न ही सत्य के करीब है। जिस बात को लघुकथा में सिर्फ इशारे से दिखाया जाता है उसे भाव सहित कहानी में ही लिखा जा सकता है। छोटी कविताओं और क्षणिकाओं में कही जाने वाली बातें बताये, जाने वाले संदेश; कहानियों और लेखों के माध्यम से ही समझाये जा सकते हैं। समय नहीं है कहकर हम किसी भी विधा का गला घोंट नहीं सकते। अपने चिंतन को कुछ शब्दों में कह सकने की क्षमता लगातार चिंतन के बाद ही आ सकती है अतः कहानी, लेख, पत्र, संस्मरण, डायरी, चिंतन आदि पर कलम चलाने की जरूरत हमेशा बनी रहेगी। नवागंतुक रचनाकारों से विशेषकर आग्रह है कि लघुकथा लिखने से पहले बड़ी रचनाओं को लिखकर खुद को परिमार्जित करें। क्योंकि बड़े लेख अथवा कहानी में लिखते हुए हम बातों की गहराई को समझ कर कम शब्दों में कहना सीख सकते हैं। इसके बाद कम शब्दों वाली विधाओं में श्रेष्ठता हासिल कर सकते हैं।
संबंधों और परिवेश की अंतर्व्यथा, अंतर्र्द्धंद, अंतर्संबंध कहने के लिए हमें बड़े स्पेस की जरूरत अवश्य ही पड़ेगी। विभिन्न भावों को समेटने के लिए शब्दों के जखीरे की जरूरत पड़ेगी ही। भावों की गहराई में उतरने के लिए विचारों की गहराई आवश्यक होगी।
स्थापित रचनाकारों की कतार में शामिल होने के लिए चिंतन, ममन और स्वयं का परिमार्जन निरंतर चलते रहना होता है। इसके साथ ही लेखन भी!
अतः बस्तर पाति के तमाम लेखकों से आग्रह है अपने लेखन में गद्य रचनाओं को शामिल करें और विशेषकर कहानी और समसामायिक विषयों पर चिंतन। विषय कुछ भी हों परन्तु उनमें मौलिकता हो, नवीनता हो। प्रायः देखने में आता है कि जैसा ट्रेण्ड चल रहा होता है वैसी कवितााओं और लघुकथाओं की बाढ़ सी आ जाती है। भले ही लोग वाह-वाह कर देते हैं परन्तु शायद ही कोई उन्हें पढ़ता हो क्योंकि सबकी वही विषय वस्तु, वही भाव, वही विवेचन! क्या आपके पास है अपने समय को बेकार करने का समय ?
सनत कुमार जैन संपादक बस्तर पाति