ग़ज़ल
नए कपड़े हैं मन भावन
दिवाली आ गई है क्या ?
रंगोली से सजा आंगन
दिवाली आ गई है क्या ?
कहीं मिष्ठान की खुशबू
कहीं नमकीन की खुशबू
बताओ मुझको ये साजन
दिवाली आ गई है क्या ?
बुझे थे कई दिनों से जो
दिये वो जल रहें है अब
प्रफुल्लित है सभी का मन
दिवाली आ गई है क्या ?
कहीं गायन कहीं वादन
कहीं पर नृत्य का आनंद
थिरकते पैरों में छन छन
दिवाली आ गई है क्या ?
कहीं पे बज रहें हैं शंख
कहीं पे बज रही घंटी
कहीं पर आरती पावन
दिवाली आ गई है क्या ?

डॉ बी प्रकाश मूर्ति “पैमाना”
जगदलपुर बस्तर (छ.ग.)